अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 142, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंदेव, दानव, भूत, पिशाच, सर्प, राक्षस, मनुष्य, किन्नर और समस्त यक्षोंके स्वामी भगवान् शंकर हैं ॥ १५ ॥ आदिर्विश्वस्य जगतो विष्णुर्ब्रह्ममयो महान् । भूतं परतरं यस्मात् त्रैलोक्ये नेह विद्यते ॥ १६ ॥ सम्पूर्ण जगत्के आदिकारण ब्रह्मस्वरूप महाविष्णु हैं। तीनों लोकोंमें उनसे बढ़कर दूसरा कोई प्राणी नहीं है ॥ १६ ॥ आश्रमाणां च सर्वेषां गार्हस्थ्यं नात्र संशयः । लोकानामादिरव्यक्तं सर्वस्यान्तस्तदेव च ॥ १७ ॥ सब आश्रमोंका आदि गृहस्थ आश्रम है, इसमें संदेह नहीं है। समस्त जगत्का आदि और अन्त अव्यक्त प्रकृति ही है ॥ १७ ॥ अहान्यस्तमयान्तानि उदयान्ता च शर्वरी । सुखस्यान्तं सदा दुःखं दुःखस्यान्तं सदा सुखम् ॥ १८ ॥ दिनका अन्त है सूर्यास्त और रात्रिका अन्त है सूर्योदय। सुखका अन्त सदा दुःख है और दुःखका अन्त सदा सुख है ॥ १८ ॥ सर्वे क्षयान्ता निचयाः पतनान्ताः समुच्छ्रयाः । संयोगाश्च वियोगान्ता मरणान्तं च जीवितम् ॥ १९ ॥ समस्त संग्रहका अन्त है विनाश, उत्थानका अन्त है पतन, संयोगका अन्त है वियोग और जीवनका अन्त है मृत्यु ॥ १९ ॥ सर्वं कृतं विनाशान्तं जातस्य मरणं ध्रुवम् । अशाश्वतं हि लोकेऽस्मिन् सदा स्थावरजङ्गमम् ॥ २० ॥ जिन-जिन वस्तुओंका निर्माण हुआ है, उनका नाश अवश्यम्भावी है। जो जन्म ले चुका है उसकी मृत्यु निश्चित है। इस जगत्में स्थावर या जंगम कोई भी सदा रहनेवाला नहीं है ॥ २० ॥ इष्टं दत्तं तपोऽधीतं व्रतानि नियमाश्च ये । सर्वमेतद् विनाशान्तं ज्ञानस्यान्तो न विद्यते ॥ २१ ॥ जितने भी यज्ञ, दान, तप, अध्ययन, व्रत और नियम हैं, उन सबका अन्तमें विनाश होता है, केवल ज्ञानका अन्त नहीं होता ॥ २१ ॥ तस्माज्ज्ञानेन शुद्धेन प्रशान्तात्मा जितेन्द्रियः । निर्ममो निरहंकारो मुच्यते सर्वपाप्मभिः ॥ २२ ॥ इसलिये विशुद्ध ज्ञानके द्वारा जिसका चित्त शान्त हो गया है, जिसकी इन्द्रियाँ वशमें हो चुकी हैं तथा जो ममता और अहंकारसे रहित हो गया है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ २२ ॥