अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनेत्रसे, मनसे और वाणीसे कहीं भी दोषदृष्टि न करे। सबके सामने या दूसरोंकी आँख बचाकर कोई बुराई न करे ॥ ४३ ॥ इन्द्रियाण्युपसंहृत्य कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः । क्षीणेन्द्रियमनोबुद्धिर्निरीहः सर्वतत्त्ववित् ॥ ४४ ॥ जैसे कछुआ अपने अंगोंको सब ओरसे समेट लेता है, उसी प्रकार इन्द्रियोंको विषयोंकी ओरसे हटा ले। इन्द्रिय, मन और बुद्धिको दुर्बल करके निश्चेष्ट हो जाय। सम्पूर्ण तत्त्वोंका ज्ञान प्राप्त करे ॥ ४४ ॥ निर्द्वन्द्वो निर्ममस्कारो निःस्वाहाकार एव च । निर्ममो निरहंकारो निर्योगक्षेम आत्मवान् ॥ ४५ ॥ द्वन्द्वोंसे प्रभावित न हो, किसीके सामने माथा न टेके। स्वाहाकार (अग्निहोत्र आदि)- का परित्याग करे। ममता और अहंकारसे रहित हो जाय, योगक्षेमकी चिन्ता न करे। मनपर विजय प्राप्त करे ॥ ४५ ॥ निराशीर्निर्गुणः शान्तो निरासक्तो निराश्रयः । आत्मसङ्गी च तत्त्वज्ञो मुच्यते नात्र संशयः ॥ ४६ ॥ जो निष्काम, निर्गुण, शान्त, अनासक्त, निराश्रय, आत्मपरायण और तत्त्वका ज्ञाता होता है, वह मुक्त हो जाता है, इसमें संशय नहीं है ॥ ४६ ॥ अपादपाणिपृष्ठं तदशिरस्कमनूदरम् । प्रहीणगुणकर्माणं केवलं विमलं स्थिरम् ॥ ४७ ॥ अगन्धमरसस्पर्शमरूपाशब्दमेव च । अनुगम्यमनासक्तममांसमपि चैव यत् ॥ ४८ ॥ निश्चिन्तमव्ययं दिव्यं कूटस्थमपि सर्वदा । सर्वभूतस्थमात्मानं ये पश्यन्ति न ते मृताः ॥ ४९ ॥ जो मनुष्य आत्माको हाथ, पैर, पीठ, मस्तक और उदर आदि अंगोंसे रहित, गुण- कर्मोंसे हीन, केवल, निर्मल, स्थिर, रूप-रस-गन्ध-स्पर्श और शब्दसे रहित, ज्ञेय, अनासक्त, हाड़-मांसके शरीरसे रहित, निश्चिन्त, अविनाशी, दिव्य और सम्पूर्ण प्राणियोंमें स्थित सदा एकरस रहनेवाला जानते हैं, उनकी कभी मृत्यु नहीं होती ॥ ४७—४९ ॥ न तत्र क्रमते बुद्धिर्नेन्द्रियाणि न देवताः । वेदा यज्ञाश्च लोकाश्च न तपो न व्रतानि च ॥ ५० ॥ यत्र ज्ञानवतां प्राप्तिरलिङ्गग्रहणा स्मृता । तस्मादलिङ्गधर्मज्ञो धर्मतत्त्वमुपाचरेत् ॥ ५१ ॥ उस आत्मतत्त्वतक बुद्धि, इन्द्रिय और देवताओंकी भी पहुँच नहीं होती। जहाँ केवल ज्ञानवान् महात्माओंकी ही गति है, वहाँ वेद, यज्ञ, लोक, तप और व्रतका भी प्रवेश नहीं