अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 166, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चाशत्तमोऽध्यायः सत्त्व और पुरुषकी भिन्नता, बुद्धिमान्की प्रशंसा, पञ्चभूतोंके गुणोंका विस्तार और परमात्माकी श्रेष्ठताका वर्णन ब्रह्मोवाच हन्त वः संप्रवक्ष्यामि यन्मां पृच्छथ सत्तमाः । गुरुणा शिष्यमासाद्य यदुक्तं तन्निबोधत ॥ १ ॥ ब्रह्माजी बोले—श्रेष्ठ महर्षियो! तुमलोगोंने जो विषय पूछा है, उसे अब मैं कहूँगा। गुरुने सुयोग्य शिष्यको पाकर जो उपदेश दिया है, उसे तुमलोग सुनो ॥ १ ॥ समस्तमिह तच्छ्रुत्वा सम्यगेवावधार्यताम् । अहिंसा सर्वभूतानामेतत् कृत्यतमं मतम् ॥ २ ॥ एतत् पदमनुद्विग्नं वरिष्ठं धर्मलक्षणम् । उस विषयको यहाँ पूर्णतया सुनकर अच्छी प्रकार धारण करो। सब प्राणियोंकी अहिंसा ही सर्वोत्तम कर्तव्य है—ऐसा माना गया है। यह साधन उद्वेगरहित, सर्वश्रेष्ठ और धर्मको लक्षित करानेवाला है ॥ २ ½ ॥ ज्ञानं निःश्रेय इत्याहुर्वृद्धा निश्चितदर्शिनः ॥ ३ ॥ तस्माज्ज्ञानेन शुद्धेन मुच्यते सर्वकिल्बिषैः । निश्चयको साक्षात् करनेवाले वृद्ध लोग कहते हैं कि ‘ज्ञान ही परम कल्याणका साधन है।’ इसलिये परम शुद्ध ज्ञानके द्वारा ही मनुष्य सब पापोंसे छूट जाता है ॥ ३ ½ ॥ हिंसापराश्च ये केचिद् ये च नास्तिकवृत्तयः । लोभमोहसमायुक्तास्ते वै निरयगामिनः ॥ ४ ॥ जो लोग प्राणियोंकी हिंसा करते हैं, नास्तिक-वृत्तिका आश्रय लेते हैं और लोभ तथा मोहमें फँसे हुए हैं, उन्हें नरकमें गिरना पड़ता है ॥ ४ ॥ आशीर्युक्तानि कर्माणि कुर्वते ये त्वतन्द्रिताः । तेऽस्मिल्लोके प्रमोदन्ते जायमानाः पुनः पुनः ॥ ५ ॥ जो लोग सावधान होकर सकाम कर्मोंका अनुष्ठान करते हैं, वे बार-बार इस लोकमें जन्म ग्रहण करके सुखी होते हैं ॥ ५ ॥ कुर्वते ये तु कर्माणि श्रद्दधाना विपश्चितः । अनाशीर्योगसंयुक्तास्ते धीराः साधुदर्शिनः ॥ ६ ॥