अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टादशोऽध्यायः जीवके गर्भ-प्रवेश, आचार-धर्म, कर्म-फलकी अनिवार्यता तथा संसारसे तरनेके उपायका वर्णन ब्राह्मण उवाच शुभानामशुभानां च नेह नाशोऽस्ति कर्मणाम् । प्राप्य प्राप्यानुपच्यन्ते क्षेत्रं क्षेत्रं तथा तथा ॥ १ ॥ सिद्ध ब्राह्मण बोले—काश्यप! इस लोकमें किये हुए शुभ और अशुभ कर्मोंका फल भोगे बिना नाश नहीं होता। वे कर्म वैसा-वैसा कर्मानुसार एकके बाद एक शरीर धारण कराकर अपना फल देते रहते हैं ॥ १ ॥ यथा प्रसूयमानस्तु फली दद्यात् फलं बहु । तथा स्याद् विपुलं पुण्यं शुद्धेन मनसा कृतम् ॥ २ ॥ जैसे फल देनेवाला वृक्ष फलनेका समय आनेपर बहुत-से फल प्रदान करता है, उसी प्रकार शुद्ध हृदयसे किये हुए पुण्यका फल अधिक होता है ॥ २ ॥ पापं चापि तथैव स्यात् पापेन मनसा कृतम् । पुरोधाय मनो हीदं कर्मण्यात्मा प्रवर्तते ॥ ३ ॥ इसी तरह कलुषित चित्तसे किये हुए पापके फलमें भी वृद्धि होती है; क्योंकि जीवात्मा मनको आगे करके ही प्रत्येक कार्यमें प्रवृत्त होता है ॥ ३ ॥ यथा कर्मसमाविष्टः काममन्युसमावृतः । नरो गर्भं प्रविशति तच्चापि शृणु चोत्तरम् ॥ ४ ॥ काम-क्रोधसे घिरा हुआ मनुष्य जिस प्रकार कर्मजालमें आबद्ध होकर गर्भमें प्रवेश करता है, उसका भी उत्तर सुनो ॥ ४ ॥ शुक्रं शोणितसंसृष्टं स्त्रिया गर्भाशयं गतम् । क्षेत्रं कर्मजमाप्नोति शुभं वा यदि वाशुभम् ॥ ५ ॥ जीव पहले पुरुषके वीर्यमें प्रविष्ट होता है, फिर स्त्रीके गर्भाशयमें जाकर उसके रजमें मिल जाता है। तत्पश्चात् उसे कर्मानुसार शुभ या अशुभ शरीरकी प्राप्ति होती है ॥ ५ ॥ सौक्ष्म्यादव्यक्तभावाच्च न च क्वचन सज्जति । सम्प्राप्य ब्राह्मणः कामं तस्मात् तद् ब्रह्म शाश्वतम् ॥ ६ ॥ जीव अपनी इच्छाके अनुसार उस शरीरमें प्रवेश करके सूक्ष्म और अव्यक्त होनेके कारण कहीं आसक्त नहीं होता है; क्योंकि वास्तवमें वह सनातन परब्रह्म-स्वरूप है ॥ ६ ॥ तद् बीजं सर्वभूतानां तेन जीवन्ति जन्तवः ।