भारतकोश
अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

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अलग-अलग स्थानपर पहुँचानेवाले हैं। संसारमें जिनके द्वारा जैसा कर्म किया गया है, उन्हें वैसा ही फल प्राप्त होता है ।। ३०-३१ ।। यन्नैव गन्धिनो रस्यं न रूपस्पर्शशब्दवत् । मन्यन्ते मुनयो बुद्धया तत् प्रधानं प्रचक्षते ।। ३२ ।। जो गन्ध, रस, रूप, स्पर्श और शब्दसे युक्त नहीं है तथा मुनिलोग बुद्धिके द्वारा जिसका मनन करते हैं, वह 'प्रधान' कहलाता है ।। ३२ ।। तत्र प्रधानमव्यक्तमव्यक्तस्य गुणो महान् । महत्प्रधानभूतस्य गुणोऽहंकार एव च ।। ३३ ।। प्रधानका दूसरा नाम अव्यक्त है। अव्यक्तका कार्य महत्तत्त्व है और प्रकृतिसे उत्पन्न महत्तत्त्वका कार्य अहंकार है ।। ३३ ।। अहंकारात् तु सम्भूतो महाभूतकृतो गुणः । पृथक्त्वेन हि भूतानां विषया वै गुणाः स्मृताः ।। ३४ ।। अहंकारसे पञ्च महाभूतोंको प्रकट करनेवाले गुणकी उत्पत्ति हुई है। पञ्च महाभूतोंके कार्य हैं रूप, रस आदि विषय। वे पृथक्-पृथक् गुणोंके नामसे प्रसिद्ध हैं ।। ३४ ।। बीजधर्म तथाव्यक्तं प्रसवात्मकमेव च । बीजधर्मा महानात्मा प्रसवश्चेति नः श्रुतम् ।। ३५ ।। अव्यक्त प्रकृति कारणरूपा भी है और कार्यरूपा भी। इसी प्रकार महत्तत्त्वके भी कारण और कार्य दोनों ही स्वरूप सुने गये हैं ।। ३५ ।। बीजधर्मस्त्वहंकारः प्रसवश्च पुनः पुनः । बीजप्रसवधर्माणि महाभूतानि पञ्च वै ।। ३६ ।। अहंकार भी कारणरूप तो है ही, कार्यरूपमें भी बारम्बार परिणत होता रहता है। पञ्च महाभूतों (पञ्चतन्मात्राओं)-में भी कारणत्व और कार्यत्व दोनों धर्म हैं। वे शब्दादि विषयोंको उत्पन्न करते हैं, इसलिये ऐसा कहा जाता है कि वे बीजधर्मी हैं ।। ३६ ।। बीजधर्मिण इत्याहुः प्रसवं च प्रकुर्वते । विशेषाः पञ्चभूतानां तेषां चित्तं विशेषणम् ।। ३७ ।। उन पाँचो भूतोंके विशेष कार्य शब्द आदि विषय हैं। उन विषयोंका प्रवर्तक चित्त है ।। ३७ ।। तत्रैकगुणमाकाशं द्विगुणो वायुरुच्यते । त्रिगुणं ज्योतिरित्याहुरापश्चापि चतुर्गुणाः ।। ३८ ।। पञ्चमहाभूतोंमेंसे आकाशमें एक ही गुण माना गया है। वायुके दो गुण बतलाये जाते हैं। तेज तीन गुणोंसे युक्त कहा गया है। जलके चार गुण हैं ।। ३८ ।। पृथ्वी पञ्चगुणा ज्ञेया चरस्थावरसंकुला । सर्वभूतकरी देवी शुभाशुभनिदर्शिनी ।। ३९ ।।

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