भारतकोश
अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

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शुक्ल, कृष्ण, रक्त, नील, पीत, अरुण, छोटा, बड़ा, मोटा, दुबला, चौकोना और गोल —इस प्रकार तैजस् रूपका बारह प्रकारसे विस्तार सत्यवादी धर्मज्ञ वृद्ध ब्राह्मणोंके द्वारा जानने योग्य कहा जाता है ।। ४६-४७ १/२ ।। शब्दस्पर्शौ च विज्ञेयौ द्विगुणो वायुरुच्यते ।। ४८ ।। वायोश्चापि गुणः स्पर्शः स्पर्शश्च बहुधा स्मृतः । शब्द और स्पर्श—ये वायुके दो गुण जानने योग्य कहे जाते हैं। इनमें भी स्पर्श ही वायुका प्रधान गुण है। स्पर्श भी कई प्रकारका माना गया है ।। ४८ १/२ ।। रूक्षः शीतस्तथैवोष्णः स्निग्धो विशद एव च ।। ४९ ।। कठिनश्चिक्कणः श्लक्ष्णः पिच्छिलो दारुणो मृदुः । एवं द्वादशविस्तारो वायव्यो गुण उच्यते ।। ५० ।। विधिवद् ब्राह्मणैः सिद्धैर्धर्मज्ञैस्तत्त्वदर्शिभिः ।। ५१ ।। रूखा, ठंडा, गरम, स्निग्ध, विशद, कठिन, चिकना, श्लक्ष्ण (हलका), पिच्छिल, कठोर और कोमल—इन बारह प्रकारोंसे वायुके गुण स्पर्शका विस्तार तत्त्वदर्शी धर्मज्ञ सिद्ध ब्राह्मणोंद्वारा विधिवत् बतलाया गया है ।। ४९—५१ ।। तत्रैकगुणमाकाशं शब्द इत्येव च स्मृतः । आकाशका शब्दमात्र एक ही गुण माना गया है। उस शब्दके बहुत-से गुण हैं। उनका विस्तारके साथ वर्णन करता हूँ ।। ५१ १/२ ।। तस्य शब्दस्य वक्ष्यामि विस्तरेण बहून् गुणान् ।। ५२ ।। षडजर्षभः स गान्धारो मध्यमः पञ्चमस्तथा । अतः परं तु विज्ञेयो निषादो धैवतस्तथा । इष्टश्चानिष्टशब्दश्च संहतः प्रविभागवान् ।। ५३ ।। एवं दशविधो ज्ञेयः शब्द आकाशसम्भवः । षड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पञ्चम, निषाद, धैवत, इष्ट (प्रिय), अनिष्ट (अप्रिय) और संहत (श्लिष्ट)—इस प्रकार विभागवाले आकाशजनित शब्दके दस भेद हैं ।। आकाशमुत्तमं भूतमहंकारस्ततः परः ।। ५४ ।। अहंकारात् परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा ततः परः । तस्मात् तु परमव्यक्तमव्यक्तात् पुरुषः परः ।। ५५ ।। आकाश सब भूतोंमें श्रेष्ठ है। उससे श्रेष्ठ अहंकार, अहंकारसे श्रेष्ठ बुद्धि, उस बुद्धिसे श्रेष्ठ आत्मा, उससे श्रेष्ठ अव्यक्त प्रकृति और प्रकृतिसे श्रेष्ठ पुरुष है ।। ५४-५५ ।। परापरज्ञो भूतानां विधिज्ञः सर्वकर्मणाम् । सर्वभूतात्मभूतात्मा गच्छत्यात्मानमव्ययम् ।। ५६ ।। जो मनुष्य सम्पूर्ण भूतोंकी श्रेष्ठता और न्यूनताका ज्ञाता, समस्त कर्मोंकी विधिका जानकार और सब प्राणियोंको आत्मभावसे देखनेवाला है, वह अविनाशी परमात्माको