अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 175, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
तपस्याका प्रभाव, आत्माका स्वरूप और उसके ज्ञानकी
महिमा तथा अनुगीताका उपसंहार
ब्रह्मोवाच भूतानामथ पञ्चानां यथैषामीश्वरं मनः । नियमे च विसर्गे च भूतात्मा मन एव च ॥ १ ॥ ब्रह्माजीने कहा— महर्षियो! जिस प्रकार इन पाँचों महाभूतोंकी उत्पत्ति और नियमन करनेमें मन समर्थ है, उसी प्रकार स्थितिकालमें भी मन ही भूतोंका आत्मा है ॥ १ ॥ अधिष्ठाता मनो नित्यं भूतानां महतां तथा । बुद्धिरैश्वर्यमाचष्टे क्षेत्रज्ञश्च स उच्यते ॥ २ ॥ उन पञ्चमहाभूतोंका नित्य आधार भी मन ही है। बुद्धि जिसके ऐश्वर्यको प्रकाशित करती है, वह क्षेत्रज्ञ कहा जाता है ॥ २ ॥ इन्द्रियाणि मनो युङ्क्ते सदश्वानिव सारथिः । इन्द्रियाणि मनो बुद्धिः क्षेत्रज्ञे युज्यते सदा ॥ ३ ॥ जैसे सारथि अच्छे घोड़ोंको अपने काबूमें रखता है, उसी प्रकार मन सम्पूर्ण इन्द्रियोंपर शासन करता है। इन्द्रिय, मन और बुद्धि—ये सदा क्षेत्रज्ञके साथ संयुक्त रहते हैं ॥ ३ ॥ महदश्वसमायुक्तं बुद्धिसंयमनं रथम् । समारुह्य स भूतात्मा समन्तात् परिधावति ॥ ४ ॥ जिसमें इन्द्रियरूपी घोड़े जुते हुए हैं, जिसका बुद्धिरूपी सारथिके द्वारा नियन्त्रण हो रहा है, उस देहरूपी रथपर सवार होकर वह भूतात्मा (क्षेत्रज्ञ) चारों ओर दौड़ लगाता रहता है ॥ ४ ॥ इन्द्रियग्रामसंयुक्तो मनःसारथिरेव च । बुद्धिसंयमनो नित्यं महान् ब्रह्ममयो रथः ॥ ५ ॥ ब्रह्ममय रथ सदा रहनेवाला और महान् है, इन्द्रियाँ उसके घोड़े, मन सारथि और बुद्धि चाबुक है ॥ ५ ॥ एवं यो वेत्ति विद्वान् वै सदा ब्रह्ममयं रथम् । स धीरः सर्वभूतेषु न मोहमधिगच्छति ॥ ६ ॥ इस प्रकार जो विद्वान् इस ब्रह्ममय रथकी सदा जानकारी रखता है, वह समस्त प्राणियोंमें धीर है और कभी मोहमें नहीं पड़ता ॥ ६ ॥ अव्यक्तादि विशेषान्तं सहस्थावरजङ्गमम् ।