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अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

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पृष्ठ 180

प्रवृत्तयश्च याः सर्वाः पश्यन्ति परिणामजाः ।। ३७ ।। ज्ञाननिष्ठ जीवन्मुक्त महात्माओंकी यही परम गति है; क्योंकि वे उन समस्त प्रवृत्तियोंको शुभाशुभ फल देनेवाली समझते हैं ।। ३७ ।। एषा गतिर्विरक्तानामेष धर्मः सनातनः । एषा ज्ञानवतां प्राप्तिरेतद् वृत्तमनिन्दितम् ।। ३८ ।। यही विरक्त पुरुषोंकी गति है, यही सनातन धर्म है, यही ज्ञानियोंका प्राप्तव्य स्थान है और यही अनिन्दित सदाचार है ।। ३८ ।। समेन सर्वभूतेषु निःस्पृहेण निराशिषा । शक्या गतिरियं गन्तुं सर्वत्र समदर्शिना ।। ३९ ।। जो सम्पूर्ण भूतोंमें समानभाव रखता है, लोभ और कामनासे रहित है तथा जिसकी सर्वत्र समान दृष्टि रहती है, वह ज्ञानी पुरुष ही इस परम गतिको प्राप्त कर सकता है ।। ३९ ।। एतद् वः सर्वमाख्यातं मया विप्रर्षिसत्तमाः । एवमाचरत क्षिप्रं ततः सिद्धिमवाप्स्यथ ।। ४० ।। ब्रह्मर्षियो! यह सब विषय मैंने विस्तारके साथ तुम लोगोंको बता दिया। इसीके अनुसार आचरण करो, इससे तुम्हें शीघ्र ही परम सिद्धि प्राप्त होगी ।। ४० ।। गुरुरुवाच इत्युक्तास्ते तु मुनयो गुरुणा ब्रह्मणा तथा । कृतवन्तो महात्मानस्ततो लोकमवाप्नुवन् ।। ४१ ।। गुरुने कहा—बेटा! ब्रह्माजीके इस प्रकार उपदेश देनेपर उन महात्मा मुनियोंने इसीके अनुसार आचरण किया। इससे उन्हें उत्तम लोककी प्राप्ति हुई ।। ४१ ।। त्वमप्येतन्महाभाग मयोक्तं ब्रह्मणो वचः । सम्यगाचर शुद्धात्मंस्ततः सिद्धिमवाप्स्यसि ।। ४२ ।। महाभाग! तुम्हारा चित्त शुद्ध है, इसलिये तुम भी मेरे बताये हुए ब्रह्माजीके उत्तम उपदेशका भलीभाँति पालन करो। इससे तुम्हें भी सिद्धि प्राप्त होगी ।। ४२ ।। वासुदेव उवाच इत्युक्तः स तदा शिष्यो गुरुणा धर्ममुत्तमम् । चकार सर्वं कौन्तेय ततो मोक्षमवाप्तवान् ।। ४३ ।। श्रीकृष्णने कहा—अर्जुन! गुरुदेवके ऐसा कहनेपर उस शिष्यने समस्त उत्तम धर्मोंका पालन किया। इससे वह संसार-बन्धनसे मुक्त हो गया ।। ४३ ।। कृतकृत्यश्च स तदा शिष्यः कुरुकुलोद्वह । तत् पदं समनुप्राप्तो यत्र गत्वा न शोचति ।। ४४ ।।