भारतकोश
अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

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ददर्शाथ मुनिश्रेष्ठमुत्तङ्कममितौजसम् ॥ ७ ॥ इस प्रकार मरुभूमिके समतल प्रदेशमें पहुँचकर महाबाहु श्रीकृष्णने अमिततेजस्वी मुनिश्रेष्ठ उत्तंकका दर्शन किया ॥ ७ ॥ स तं सम्पूज्य तेजस्वी मुनिं पृथुललोचनः । पूजितस्तेन च तदा पर्यपृच्छदनामयम् ॥ ८ ॥ विशाल नेत्रोंवाले तेजस्वी श्रीकृष्ण उत्तंक मुनिकी पूजा करके स्वयं भी उनके द्वारा पूजित हुए। तत्पश्चात् उन्होंने मुनिका कुशल-समाचार पूछा ॥ ८ ॥ स पृष्टः कुशलं तेन सम्पूज्य मधुसूदनम् । उत्तङ्को ब्राह्मणश्रेष्ठस्ततः पप्रच्छ माधवम् ॥ ९ ॥ उनके कुशल-मंगल पूछनेपर विप्रवर उत्तंकने भी मधुसूदन माधवकी पूजा करके उनसे इस प्रकार प्रश्न किया— ॥ ९ ॥ कच्चिच्छौरे त्वया गत्वा कुरुपाण्डवसद्म तत् । कृतं सौभ्रात्रमचलं तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ १० ॥ 'शूरनन्दन! क्या तुम कौरवों और पाण्डवोंके घर जाकर उनमें अविचल भ्रातृभाव स्थापित कर आये? यह बात मुझे विस्तारके साथ बताओ ॥ १० ॥ अपि संधाय तान् वीरानुपावृत्तोऽसि केशव । सम्बन्धिनः स्वदयितान् सततं वृष्णिपुङ्गव ॥ ११ ॥ केशव! क्या तुम उन वीरोंमें संधि कराकर ही लौट रहे हो? वृष्णिपुंगव! वे कौरव, पाण्डव तुम्हारे सम्बन्धी तथा तुम्हें सदा ही परम प्रिय रहे हैं ॥ ११ ॥ कच्चित् पाण्डुसुताः पञ्च धृतराष्ट्रस्य चात्मजाः । लोकेषु विहरिष्यन्ति त्वया सह परंतप ॥ १२ ॥ 'परंतप! क्या पाण्डुके पाँचों पुत्र और धृतराष्ट्रके भी सभी आत्मज संसारमें तुम्हारे साथ सुखपूर्वक विचर सकेंगे? ॥ स्वराष्ट्रे ते च राजानः कच्चित् प्राप्स्यन्ति वै सुखम् । कौरवेषु प्रशान्तेषु त्वया नाथेन केशव ॥ १३ ॥ 'केशव! तुम-जैसे रक्षक एवं स्वामीके द्वारा कौरवोंके शान्त कर दिये जानेपर अब पाण्डवनरेशोंको अपने राज्यमें सुख तो मिलेगा न? ॥ १३ ॥ या मे सम्भावना तात त्वयि नित्यमवर्तत । अपि सा सफला तात कृता ते भरतान् प्रति ॥ १४ ॥ 'तात! मैं सदा तुमसे इस बातकी सम्भावना करता था कि तुम्हारे प्रयत्नसे कौरव- पाण्डवोंमें मेल हो जायगा। मेरी जो वह सम्भावना थी, भरतवंशियोंके सम्बन्धमें तुमने वह सफल तो किया है न?' ॥ १४ ॥ श्रीभगवानुवाच