अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजो धर्मके अनुसार बर्ताव करता है, वह जहाँ जिस अवस्थामें हो, वहाँ उसी स्थितिमें उसको अपने कर्मानुसार उत्तम फलकी प्राप्ति होती है और वह धीरे-धीरे अधिक काल बीतनेपर संसार-सागरसे तर जाता है ॥ एवं पूर्वकृतं कर्म नित्यं जन्तुः प्रपद्यते । सर्वं तत्कारणं येन विकृतोऽयमिहागतः ॥ २३ ॥ इस प्रकार जीव सदा अपने पूर्वजन्मोंमें किये हुए कर्मोंका फल भोगता है। यह आत्मा निर्विकार ब्रह्म होनेपर भी विकृत होकर इस जगत्में जो जन्म धारण करता है, उसमें कर्म ही कारण है ॥ २३ ॥ शरीरग्रहणं चास्य केन पूर्वं प्रकल्पितम् । इत्येवं संशयो लोके तच्च वक्ष्याम्यतः परम् ॥ २४ ॥ आत्माके शरीर धारण करनेकी प्रथा सबसे पहले किसने चलायी है, इस प्रकारका संदेह प्रायः लोगोंके मनमें उठा करता है, अतः उसीका उत्तर दे रहा हूँ ॥ २४ ॥ शरीरमात्मनः कृत्वा सर्वलोकपितामहः । त्रैलोक्यमसृजद् ब्रह्मा कृत्स्नं स्थावरजङ्गमम् ॥ २५ ॥ सम्पूर्ण जगत्के पितामह ब्रह्माजीने सबसे पहले स्वयं ही शरीर धारण करके स्थावर- जंगमरूप समस्त त्रिलोकीकी (कर्मानुसार) रचना की ॥ २५ ॥ ततः प्रधानमसृजत् प्रकृतिं स शरीरिणाम् । यया सर्वमिदं व्याप्तं यां लोके परमां विदुः ॥ २६ ॥ उन्होंने प्रधान नामक तत्त्वकी उत्पत्ति की, जो देहधारी जीवोंकी प्रकृति कहलाती है। जिसने इस सम्पूर्ण जगत्को व्याप्त कर रखा है तथा लोकमें जिसे मूल प्रकृतिके नामसे जानते हैं ॥ २६ ॥ इदं तत्क्षरमित्युक्तं परं त्वमृतमक्षरम् । त्रयाणां मिथुनं सर्वमेकैकस्य पृथक् पृथक् ॥ २७ ॥ यह प्राकृत जगत् क्षर कहलाता है, इससे भिन्न अविनाशी जीवात्माको अक्षर कहते हैं। (इनसे विलक्षण शुद्ध परब्रह्म हैं)—इन तीनोंमेंसे जो दो तत्त्व—क्षर और अक्षर हैं, वे सब प्रत्येक जीवके लिये पृथक्-पृथक् होते हैं ॥ असृजत् सर्वभूतानि पूर्वदृष्टः प्रजापतिः । स्थावराणि च भूतानि इत्येषा पौर्विकी श्रुतिः ॥ २८ ॥ श्रुतिमें जो सृष्टिके आरम्भमें सत्रूपसे निर्दिष्ट हुए हैं, उन प्रजापतिने समस्त स्थावर भूतों और जंगम प्राणियोंकी सृष्टि की है, यह पुरातन श्रुति है ॥ २८ ॥ तस्य कालपरीमाणमकरोत् स पितामहः । भूतेषु परिवृत्तिं च पुनरावृत्तिमेव च ॥ २९ ॥