अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः श्रीकृष्णका उत्तंक मुनिको विश्वरूपका दर्शन कराना और मरुदेशमें जल प्राप्त होनेका वरदान देना उत्तङ्क उवाच अभिजानामि जगतः कर्तारं त्वां जनार्दन । नूनं भवत्प्रसादोऽयमिति मे नास्ति संशयः ॥ १ ॥ उत्तंकने कहा—जनार्दन! मैं यह जानता हूँ कि आप सम्पूर्ण जगत्के कर्ता हैं। निश्चय ही यह आपकी कृपा है (जो आपने मुझे अध्यात्मतत्त्वका उपदेश दिया), इसमें संशय नहीं है ॥ १ ॥ चित्तं च सुप्रसन्नं मे त्वद्भावगतमच्युत । विनिवृत्तं च मे शापादिति विद्धि परंतप ॥ २ ॥ शत्रुओंको संताप देनेवाले अच्युत! अब मेरा चित्त अत्यन्त प्रसन्न और आपके प्रति भक्तिभावसे परिपूर्ण हो गया है; अतः इसे शाप देनेके विचारसे निवृत्त हुआ समझें ॥ २ ॥ यदि त्वनुग्रहं कंचित् त्वत्तोऽर्हामि जनार्दन । द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं तन्निदर्शय ॥ ३ ॥ जनार्दन! यदि मैं आपसे कुछ भी कृपा प्राप्त करनेका अधिकारी होऊँ तो आप मुझे अपना ईश्वरीय रूप दिखा दीजिये। आपके उस रूपको देखनेकी बड़ी इच्छा है ॥ ३ ॥ वैशम्पायन उवाच ततः स तस्मै प्रीतात्मा दर्शयामास तद् वपुः । शाश्वतं वैष्णवं धीमान् ददृशे यद् धनंजयः ॥ ४ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! तब परम बुद्धिमान् भगवान् श्रीकृष्णने प्रसन्नचित्त होकर उन्हें अपने उसी सनातन वैष्णव स्वरूपका दर्शन कराया, जिसे युद्धके प्रारम्भमें अर्जुनने देखा था ॥ ४ ॥ स ददर्श महात्मानं विश्वरूपं महाभुजम् । सहस्रसूर्यप्रतिमं दीप्तिमत् पावकोपमम् ॥ ५ ॥ उत्तंक मुनिने उस विश्वरूपका दर्शन किया, जिसका स्वरूप महान् था। जो सहस्रों सूर्योंके समान प्रकाशमान तथा बड़ी-बड़ी भुजाओंसे सुशोभित था। उससे प्रज्वलित अग्निके समान लपटें निकल रही थीं ॥ ५ ॥ सर्वमाकाशमावृत्य तिष्ठन्तं सर्वतोमुखम् । तद् दृष्ट्वा परमं रूपं विष्णोर्वैष्णवमद्भुतम् ।