भारतकोश
अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 204, कुल 421 में से

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पृष्ठ 204

ततः कदाचिद् भगवानुत्तङ्कस्तोयकाङ्क्षया । तृषितः परिचक्राम मरौ सस्मार चाच्युतम् ॥ १५ ॥ तत्पश्चात् एक दिन उत्तंक मुनिको बड़ी प्यास लगी। वे पानीकी इच्छासे उस मरुभूमिमें चारों ओर घूमने लगे। घूमते-घूमते उन्होंने भगवान् श्रीकृष्णका स्मरण किया ॥ १५ ॥ ततो दिग्वाससं धीमान् मातङ्गं मलपङ्किनम् । अपश्यत मरौ तस्मिन् श्वयूथपरिवारितम् ॥ १६ ॥ इतनेहीमें उन बुद्धिमान् मुनिको उस मरुप्रदेशमें कुत्तोंके झुंडसे घिरा हुआ एक नंग- धड़ंग चाण्डाल दिखायी पड़ा, जिसके शरीरमें मैल और कीचड़ जमी हुई थी ॥ १६ ॥ भीषणं बद्धनिस्त्रिंशं बाणकार्मुकधारिणम् । तस्याधः स्रोतसोऽपश्यद् वारि भूरि द्विजोत्तमः ॥ १७ ॥ वह देखनेमें बड़ा भयंकर था। उसने कमरमें तलवार बाँध रखी थी और हाथोंमें धनुष- बाण धारण किये थे। द्विजश्रेष्ठ उत्तंकने देखा—उसके नीचे पैरोंके समीप एक छिद्रसे प्रचुर जलकी धारा गिर रही है ॥ १७ ॥ स्मरन्नेव च तं प्राह मातङ्गः प्रहसन्निव । एह्युत्तङ्क प्रतीच्छस्व मत्तो वारि भृगूद्वह ॥ १८ ॥ कृपा हि मे सुमहती त्वां दृष्ट्वा तृट् समाश्रितम् । इत्युक्तस्तेन स मुनिस्तत् तोयं नाभ्यनन्दत ॥ १९ ॥ मुनिको पहचानते ही वह जोर-जोरसे हँसता हुआ-सा बोला—‘भृगुकुलतिलक उत्तंक! आओ, मुझसे जल ग्रहण करो। तुम्हें प्याससे पीड़ित देखकर मुझे तुमपर बड़ी दया आ रही है।’ चाण्डालके ऐसा कहनेपर भी मुनिने उसके जलका अभिनन्दन नहीं किया—उसे लेनेसे इनकार कर दिया ॥ १८-१९ ॥ चिक्षेप च स तं धीमान् वाग्भिरुग्राभिरच्युतम् । पुनः पुनश्च मातङ्गः पिबस्वेति तमब्रवीत् ॥ २० ॥ उस समय बुद्धिमान् उत्तंकने अपने कठोर वचनों-द्वारा भगवान् श्रीकृष्णपर भी आक्षेप किया। उधर चाण्डाल बारंबार आग्रह करने लगा—‘महर्षे! जल पी लीजिये’ ॥ २० ॥ न चापिबत् स सक्रोधः क्षुभितेनान्तरात्मना । स तथा निश्चयात् तेन प्रत्याख्यातो महात्मना ॥ २१ ॥ उत्तंकने उस जलको नहीं पीया। वे अत्यन्त कुपित हो उठे थे। उनके अन्तःकरणमें बड़ा क्षोभ था। उन महात्माने अपने निश्चयपर अटल रहकर चाण्डालको जवाब दे दिया ॥ २१ ॥ श्वभिः सह महाराज तत्रैवान्तरधीयत । उत्तङ्कस्तं तथा दृष्ट्वा ततो व्रीडितमानसः ॥ २२ ॥ मेने प्रलब्धमात्मानं कृष्णेनामित्रघातिना ।

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