भारतकोश
अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

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पृष्ठ 209

तं क्रमेण जरा तात प्रतिपेदे महामुनिम् ॥ ६ ॥ उन महर्षिने अपने सहस्रों शिष्योंको पढ़ाकर घर जानेकी आज्ञा दे दी; परंतु उत्तङ्कपर अधिक प्रेम होनेके कारण वे उन्हें घर जानेकी आज्ञा नहीं देना चाहते थे। तात! क्रमशः उन महामुनि उत्तंकको वृद्धावस्था प्राप्त हुई ॥ ६ ॥ न चान्वबुध्यत तदा स मुनिर्गुरुवत्सलः । ततः कदाचिद् राजेन्द्र काष्ठान्यानयितुं ययौ ॥ ७ ॥ उत्तङ्कः काष्ठभारं च महान्तं समुपानयत् । किंतु वे गुरुवत्सल महर्षि यह नहीं जान सके कि मेरा बुढ़ापा आ गया। राजेन्द्र! एक दिन उत्तंक मुनि लकड़ियाँ लानेके लिये वनमें गये और वहाँसे काठका बहुत बड़ा बोझ उठा लाये ॥ ७ १/२ ॥ स तद्भाराभिभूतात्मा काष्ठभारमरिंदम ॥ ८ ॥ निचिक्षेप क्षितौ राजन् परिश्रान्तो बुभुक्षितः । तस्य काष्ठे विलग्नाभूज्जटा रूप्यसमप्रभा ॥ ९ ॥ ततः काष्ठैः सह तदा पपात धरणीतले । शत्रुदमन नरेश! बोझ भारी होनेके कारण वे बहुत थक गये। उनका शरीर लकड़ियोंके भारसे दब गया था। वे भूखसे पीड़ित हो रहे थे। जब आश्रमपर आकर उस बोझको वे जमीनपर गिराने लगे, उस समय चाँदीके तारकी भाँति सफेद रंगकी उनकी जटा लकड़ीमें चिपक गयी थी, जो उन लकड़ियोंके साथ ही जमीनपर गिर पड़ी ॥ ८-९ १/२ ॥ ततः स भारनिष्पिष्टः क्षुधाविष्टश्च भारत ॥ १० ॥ दृष्ट्वा तां वयसोऽवस्थां रुरोदार्तस्वरस्तदा । भारत! भारसे तो वे पिस ही गये थे, भूखने भी उन्हें व्याकुल कर दिया था। अतः अपनी उस अवस्थाको देखकर वे उस समय आर्त स्वरसे रोने लगे ॥ १० १/२ ॥ ततो गुरुसुता तस्य पद्मपत्रनिभानना ॥ ११ ॥ जग्राहाश्रूणि सुश्रोणी करेण पृथुलोचना । पितुर्नियोगाद् धर्मज्ञा शिरसावनता तदा ॥ १२ ॥ तब कमलदलके समान प्रफुल्ल मुखवाली विशाललोचना परम सुन्दरी धर्मज्ञ गुरुपुत्रीने पिताकी आज्ञा पाकर विनीत भावसे सिर झुकाये वहाँ आयी और अपने हाथोंमें उसने मुनिके आँसू ग्रहण कर लिये ॥ तस्या निपेततुर्दग्धौ करौ तैरश्रुबिन्दुभिः । न हि तानश्रुपातांस्तु शक्ता धारयितुं मही ॥ १३ ॥ उन अश्रुबिन्दुओंसे उसके दोनों हाथ जल गये और आँसुओंसहित पृथ्वीसे जा लगे। परंतु पृथ्वी भी उन गिरते हुए अश्रुबिन्दुओंके धारण करनेमें असमर्थ हो गयी ॥ १३ ॥ गौतमस्त्वब्रवीद् विप्रमुत्तङ्कं प्रीतमानसः ।