भारतकोश
अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

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उत्तंकने पूछा—द्विजश्रेष्ठ! प्रभो! मैं आपको गुरुदक्षिणामें क्या दूँ? यह बताइये। उसे आपको अर्पित करके आज्ञा लेकर घरको जाऊँ ॥ २० ॥ गौतम उवाच दक्षिणा परितोषो वै गुरूणां सद्द्भिरुच्यते । तव ह्याचरतो ब्रह्मंस्तुष्टोऽहं वै न संशयः ॥ २१ ॥ गौतमने कहा—ब्रह्मन्! सत्पुरुष कहते हैं कि गुरुजनोंको संतुष्ट करना ही उनके लिये सबसे उत्तम दक्षिणा है। तुमने जो सेवा की है, उससे मैं बहुत संतुष्ट हूँ, इसमें संशय नहीं है ॥ २१ ॥ इत्थं च परितुष्टं मां विजानीहि भृगूद्वह । युवा षोडशवर्षो हि यद्यद्य भविता भवान् ॥ २२ ॥ ददानि पत्नीं कन्यां च स्वां ते दुहितरं द्विज । एतामृतेऽङ्गना नान्या त्वत्तेजोऽर्हति सेवितुम् ॥ २३ ॥ भृगुकुलभूषण! इस तरह तुम मुझे पूर्ण संतुष्ट जानो। यदि आज तुम सोलह वर्षके तरुण हो जाओ तो मैं तुम्हें पत्नीरूपसे अपनी कुमारी कन्या अर्पित कर दूँगा; क्योंकि इसके सिवा दूसरी कोई स्त्री तुम्हारे तेजको नहीं सह सकती ॥ २२-२३ ॥ ततस्तां प्रतिजग्राह युवा भूत्वा यशस्विनीम् । गुरुणा चाभ्यनुज्ञातो गुरुपत्नीमथाब्रवीत् ॥ २४ ॥ तब उत्तंकने तपोबलसे तरुण होकर उस यशस्विनी गुरुपुत्रीका पाणिग्रहण किया। तत्पश्चात् गुरुकी आज्ञा पाकर वे गुरुपत्नीसे बोले— ॥ २४ ॥ कं भवत्यै प्रयच्छामि गुर्वर्थं विनियुङ्क्ष्व माम् । प्रियं हितं च काङ्क्षामि प्राणैरपि धनैरपि ॥ २५ ॥ ‘माताजी! मुझे आज्ञा दीजिये, मैं गुरुदक्षिणामें आपको क्या दूँ? अपना धन और प्राण देकर भी मैं आपका प्रिय एवं हित करना चाहता हूँ ॥ २५ ॥ यद् दुर्लभं हि लोकेऽस्मिन् रत्नमत्यद्भुतं महत् । तदानयेयं तपसा न हि मेऽत्रास्ति संशयः ॥ २६ ॥ ‘इस लोकमें जो अत्यन्त दुर्लभ, अद्भुत एवं महान् रत्न हो, उसे भी मैं तपस्याके बलसे ला सकता हूँ; इसमें संशय नहीं है’ ॥ २६ ॥ अहल्योवाच परितुष्टास्मि ते विप्र नित्यं भक्त्या तवानघ । पर्याप्तमेतद् भद्रं ते गच्छ तात यथेप्सितम् ॥ २७ ॥ अहल्या बोली—निष्पाप ब्राह्मण! मैं तुम्हारे भक्ति-भावसे सदा संतुष्ट हूँ। बेटा! मेरे लिये इतना ही बहुत है। तुम्हारा कल्याण हो। अब तुम्हारी जहाँ इच्छा हो, जाओ ॥ २७ ॥