अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतदनन्तर हर्षमें भरे हुए पाँचों पाण्डव मरनेसे बची हुई सेनाके द्वारा उसपर चारों ओरसे घेरा डालकर तालाबमें बैठे हुए दुर्योधनके पास जा पहुँचे ॥ २८ ॥ विगाह्य सलिलं त्वाशु वाग्बाणैर्भृशविक्षतः । उत्थाय स गदापाणिर्युद्धाय समुपस्थितः ॥ २९ ॥ उस समय भीमसेनके वाग्बाणोंसे अत्यन्त घायल होकर दुर्योधन तुरंत पानीसे बाहर निकला और हाथमें गदा ले युद्धके लिये उद्यत हो पाण्डवोंके पास आ गया ॥ २९ ॥ ततः स निहतो राजा धार्तराष्ट्रो महारणे । भीमसेनेन विक्रम्य पश्यतां पृथिवीक्षिताम् ॥ ३० ॥ तत्पश्चात् उस महासमरमें सब राजाओंके देखते-देखते भीमसेनने पराक्रम करके धृतराष्ट्रपुत्र राजा दुर्योधनको मार डाला ॥ ३० ॥ ततस्तत् पाण्डवं सैन्यं प्रसुप्तं शिबिरे निशि । निहतं द्रोणपुत्रेण पितुर्वधममृष्यता ॥ ३१ ॥ इसके बाद रातके समय जब पाण्डवोंकी सेना अपनी छावनीमें निश्चिन्त सो रही थी, उसी समय द्रोणपुत्र अश्वत्थामाने अपने पिताके वधको न सह सकनेके कारण आक्रमण किया और सबको मार गिराया ॥ ३१ ॥ हतपुत्रा हतबला हतमित्रा मया सह । युयुधानसहायेन पञ्च शिष्टास्तु पाण्डवाः ॥ ३२ ॥ उस समय पाण्डवोंके पुत्र, मित्र और सैनिक सब मारे गये। केवल मेरे और सात्यकिके साथ पाँचों पाण्डव शेष रह गये हैं ॥ ३२ ॥ सहैव कृपभोजाभ्यां द्रौणिर्युद्धादमुच्यत । युयुत्सुश्चापि कौरव्यो मुक्तःपाण्डवसंश्रयात् ॥ ३३ ॥ कौरवोंके पक्षमें कृपाचार्य और कृतवर्माके साथ द्रोणपुत्र अश्वत्थामा युद्धसे जीवित बचा है। कुरुवंशी युयुत्सु भी पाण्डवोंका आश्रय लेनेके कारण बच गये हैं ॥ ३३ ॥ निहते कौरवेन्द्रे तु सानुबन्धे सुयोधने । विदुरः संजयश्चैव धर्मराजमुपस्थितौ ॥ ३४ ॥ बन्धु-बान्धवोंसहित कौरवराज दुर्योधनके मारे जानेपर विदुर और संजय धर्मराज युधिष्ठिरके आश्रयमें आ गये हैं ॥ ३४ ॥ एवं तदभवद् युद्धमहान्यष्टादश प्रभो । यत्र ते पृथिवीपाला निहताः स्वर्गमावसन् ॥ ३५ ॥ प्रभो! इस प्रकार अठारह दिनोंतक वह युद्ध हुआ है। उसमें जो राजा मारे गये हैं, वे स्वर्गलोकमें जा बसे हैं ॥ ३५ ॥ वैशम्पायन उवाच