अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपितरं दुःखिततरो गोविन्दो वाक्यमब्रवीत् । इस प्रकार पिताको अत्यन्त दुःखित होकर बहुत विलाप करते देख श्रीकृष्ण स्वयं भी बहुत दुःखी हो गये और उन्हें सान्त्वना देते हुए इस प्रकार बोले— ।। १५१/२ ।। न तेन विकृतं वक्त्रं कृतं संग्राममूर्धनि ।। १६ ।। न पृष्ठतः कृतश्चापि संग्रामस्तेन दुस्तरः । 'पिताजी! अभिमन्युने संग्राममें आगे रहकर शत्रुओंका सामना किया। उसने कभी भी अपना मुख विकृत नहीं किया। उस दुस्तर युद्धमें उसने कभी पीठ नहीं दिखायी ।। १६१/२ ।। निहत्य पृथिवीपालान् सहस्रशतसंघशः ।। १७ ।। खेदितो द्रोणकर्णाभ्यां दौःशासनिवशं गतः । 'लाखों राजाओंके समूहोंको मारकर द्रोण और कर्णके साथ युद्ध करते-करते जब वह बहुत थक गया, उस समय दुःशासनके पुत्रके द्वारा मारा गया ।। १७१/२ ।। एको ह्येकेन सततं युध्यमाने यदि प्रभो ।। १८ ।। न स शक्येत संग्रामे निहन्तुमपि वज्रिणा । 'प्रभो! यदि निरन्तर उसे एक-एक वीरके साथ ही युद्ध करना पड़ता तो रणभूमिमें वज्रधारी इन्द्र भी उसे नहीं मार सकते थे (परन्तु वहाँ तो बात ही दूसरी हो गयी) ।। १८१/२ ।। समाहृते च संग्रामात् पार्थे संशप्तकैस्तदा ।। १९ ।। पर्यावार्यत संक्रुद्धैः स द्रोणादिभिराहवे । 'अर्जुन संशप्तकोंके साथ युद्ध करते हुए संग्राम-भूमिसे बहुत दूर हट गये थे। इस अवसरसे लाभ उठाकर क्रोधमें भरे हुए द्रोणाचार्य आदि कई वीरोंने मिलकर उस बालकको चारों ओरसे घेर लिया ।। १९१/२ ।। ततः शत्रुवधं कृत्वा सुमहान्तं रणे पितः ।। २० ।। दौहित्रस्तव वार्ष्णेय दौःशासनिवशं गतः । 'वृष्णिकुल भूषण पिताजी! तो भी शत्रुओंका बड़ा भारी संहार करके आपका वह दौहित्र युद्धमें दुःशासन-कुमारके अधीन हुआ ।। २०१/२ ।। नूनं च स गतः स्वर्गं जहि शोकं महामते ।। २१ ।। न हि व्यसनमासाद्य सीदन्ति कृतबुद्धयः । 'महामते! अभिमन्यु निश्चय ही स्वर्गलोकमें गया है; अतः आप उसके लिये शोक न कीजिये। पवित्र बुद्धिवाले साधु पुरुष संकटमें पड़नेपर भी इतने खिन्न नहीं होते हैं ।। २११/२ ।। द्रोणकर्णप्रभृतयो येन प्रतिसमासिताः ।। २२ ।। रणे महेन्द्रप्रतिमाः स कथं नाप्नुयाद् दिवम् ।