अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसमाहृष्य तु वार्ष्णेयी वैराटीमब्रवीदिदम् ।। ३९ ।। 'यदुकुलभूषण! तत्पश्चात् ब्राह्मणोंको बहुत-सी गौएँ दान देकर कुन्तीने विराटकुमारी उत्तरासे कहा— ।। ३९ ।। वैराटि नेह संतापस्त्वया कार्यो ह्यनिन्दिते । भर्तारं प्रति सुश्रोणि गर्भस्थं रक्ष वै शिशुम् ।। ४० ।। 'अनिन्द्य गुणोंवाली विराटराजकुमारी! अब तुम्हें यहाँ पतिके लिये संताप नहीं करना चाहिये। सुन्दरि! तुम्हारे गर्भमें जो अभिमन्युका बालक है, उसकी रक्षा करो' ।। ४० ।। एवमुक्त्वा ततः कुन्ती विरराम महाद्युते । तामनुज्ञाप्य चैवेमां सुभद्रां समुपानयम् ।। ४१ ।। 'महाद्युते! ऐसा कहकर कुन्तीदेवी चुप हो गयीं। उन्हींकी आज्ञासे मैं इस सुभद्रा देवीको साथ लाया हूँ ।। ४१ ।। एवं स निधनं प्राप्तो दौहित्रस्तव मानद । संतापं त्यज दुर्धर्ष मा च शोके मनः कृथाः ।। ४२ ।। 'मानद! इस प्रकार आपका दौहित्र अभिमन्यु मृत्युको प्राप्त हुआ है। दुर्धर्ष वीर! आप संताप छोड़ दें और मनको शोकमग्न न करें' ।। ४२ ।। इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि वसुदेवसान्त्वने एकषष्टितमोऽध्यायः ।। ६१ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें वसुदेवको सान्त्वनाविषयक इकसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ६१ ।।