अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअतीव दुःखसंतप्ता न शमं चोपलेभिरे । तथैव पाण्डवा वीरा नगरे नागसाह्वये ॥ ७ ॥ नोपागच्छन्त वै शान्तिमभिमन्युविनाकृताः । वे सबके सब अत्यन्त दुःखसे संतप्त थे। उन्हें शान्ति नहीं मिलती थी। उसी प्रकार हस्तिनापुरमें वीर पाण्डव भी अभिमन्युसे रहित होकर शान्ति नहीं पाते थे ॥ ७ १/२ ॥ सुबहूनि च राजेन्द्र दिवसानि विराटजा ॥ ८ ॥ नाभुङ्क्त पतिदुःखार्ता तदभूत् करुणं महत् । कुक्षिस्थ एव तस्याथ गर्भो वै सम्प्रलीयत ॥ ९ ॥ राजेन्द्र! विराटकुमारी उत्तराने पतिके दुःखसे आतुर हो बहुत दिनोंतक भोजन ही नहीं किया। उसकी वह दशा बड़ी ही करुणाजनक थी। उसके गर्भका बालक उदरहीमें पड़ा- पड़ा क्षीण होने लगा ॥ ८-९ ॥ आजगाम ततो व्यासो ज्ञात्वा दिव्येन चक्षुषा । समागम्याब्रवीद् धीमान् पृथां पृथुलोचनाम् ॥ १० ॥ उत्तरां च महातेजाः शोकः संत्यज्यतामयम् । भविष्यति महातेजाः पुत्रस्तव यशस्विनि ॥ ११ ॥ उसकी इस दशाको दिव्य दृष्टिसे जानकर महान् तेजस्वी बुद्धिमान् महर्षि व्यास वहाँ आये और विशाल नेत्रोंवाली कुन्ती तथा उत्तरासे मिलकर उन्हें समझाते हुए इस प्रकार बोले—'यशस्विनि उत्तरे! तुम यह शोक त्याग दो। तुम्हारा पुत्र महातेजस्वी होगा ॥ १०-११ ॥