अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउपलब्ध हुए ।। १४-१५ ।। उद्धारयामास तदा धर्मराजो युधिष्ठिरः । तेषां रक्षणमप्यासीन्महान् करपुटस्तथा ।। १६ ।। धर्मराज युधिष्ठिरने उस समय उन सब बर्तनोंको भूमि खोदकर निकलवाया। उन्हें रखनेके लिये बड़ी-बड़ी संदूकें लायी गयी थीं ।। १६ ।। नद्धं च भाजनं राजंस्तुलाधर्मभवन्नृप । वाहनं पाण्डुपुत्रस्य तत्रासीत् तु विशाम्पते ।। १७ ।। राजन्! एक-एक संदूकमें बंद किये हुए बर्तनोंका बोझ आधा-आधा भार होता था। प्रजानाथ! उन सबको ढोनेके लिये पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरके वाहन भी वहाँ उपस्थित थे ।। १७ ।। षष्टिरुष्ट्रसहस्राणि शतानि द्विगुणा हयाः । वारणाश्च महाराज सहस्रशतसम्मिताः ।। १८ ।। शकटानि रथाश्चैव तावदेव करेणवः । खराणां पुरुषाणां च परिसंख्या न विद्यते ।। १९ ।। महाराज! साठ हजार ऊँट, एक करोड़ बीस लाख घोड़े, एक लाख हाथी, एक लाख रथ, एक लाख छकड़े और उतनी ही हथिनियाँ थीं। गधों और मनुष्योंकी तो गिनती ही नहीं थी ।। १८-१९ ।। एतद् वित्तं तदभवद् यदुद्दध्रे युधिष्ठिरः । षोडशाष्टौ चतुर्विंशत्सहस्रं भारलक्षणम् ।। २० ।। एतेष्वादाय तद् द्रव्यं पुनरभ्यर्च्य पाण्डवः । महादेवं प्रति ययौ पुरं नागह्वयं प्रति ।। २१ ।। द्वैपायनाभ्यनुज्ञातः पुरस्कृत्य पुरोहितम् । युधिष्ठिरने वहाँ जितना धन खुदवाया था, वह सोलह करोड़ आठ लाख और चौबीस हजार भार सुवर्ण था। उन्होंने उपर्युक्त सब वाहनोंपर धन लदवाकर पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने पुनः महादेवजीका पूजन किया और व्यासजीकी आज्ञा लेकर पुरोहित धौम्य मुनिको आगे करके हस्तिनापुरको प्रस्थान किया ।। २०-२१ ½ ।।