अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसंदेह नहीं है ।। २२ ।। अब्रवीत् किल दाशार्ह वैराटीमार्जुनिस्तदा । मातुलस्य कुलं भद्रे तव पुत्रो गमिष्यति ।। २३ ।। गत्वा वृष्ण्यन्धककुलं धनुर्वेदं ग्रहीष्यति । अस्त्राणि च विचित्राणि नीतिशास्त्रं च केवलम् ।। २४ ।। ‘दाशार्ह! अभिमन्युने उत्तरासे कभी स्नेहवश कहा था—‘‘कल्याणी! तुम्हारा पुत्र मेरे मामाके यहाँ जायगा-वृष्णि एवं अन्धकोंके कुलमें जाकर धनुर्वेद, नाना प्रकारके विचित्र अस्त्र-शस्त्र तथा विशुद्ध नीतिशास्त्रकी शिक्षा प्राप्त करेगा’’ ।। २३-२४ ।। इत्येतत् प्रणयात् तात सौभद्रः परवीरहा । कथयामास दुर्धर्षस्तथा चैतन्न संशयः ।। २५ ।। ‘तात! शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले दुर्धर्ष वीर सुभद्रकुमारने जो प्रेमपूर्वक यह बात कही थी, यह निस्संदेह सत्य होनी चाहिये ।। २५ ।। तास्त्वां वयं प्रणम्येह याचामो मधुसूदन । कुलस्यास्य हितार्थं तं कुरु कल्याणमुत्तमम् ।। २६ ।। ‘मधुसूदन! इस कुलकी भलाईके लिये हम सब लोग तुम्हारे पैरों पड़कर भीख माँगती हैं, इस बालकको जिलाकर तुम कुरुकुलका सर्वोत्तम कल्याण करो’ ।। २६ ।। एवमुक्त्वा तु वार्ष्णेयं पृथा पृथुललोचना । उच्छ्रित्य बाहू दुःखार्ता ताश्चान्याः प्रापतन् भुवि ।। २७ ।। श्रीकृष्णसे ऐसा कहकर विशाललोचना कुन्ती दोनों बाँहें ऊपर उठाकर दुःखसे आर्त हो पृथ्वीपर गिर पड़ीं। दूसरी स्त्रियोंकी भी यही दशा हुई ।। २७ ।। अब्रुवंश्च महाराज सर्वाः सास्त्राविलेक्षणाः । स्वस्त्रीयो वासुदेवस्य मृतो जात इति प्रभो ।। २८ ।। समर्थ महाराज! उन सबकी आँखोंसे आँसुओंकी धारा बह रही थी और वे सभी रो- रोकर कह रही थीं कि ‘हाय! श्रीकृष्णके भानजेका बालक मरा हुआ पैदा हुआ’ ।। २८ ।। एवमुक्ते ततः कुन्तीं पर्यगृह्णाज्जनार्दनः । भूमौ निपतितां चैनां सान्त्वयामास भारत ।। २९ ।। भरतनन्दन! उन सबके ऐसा कहनेपर जनार्दन श्रीकृष्णने कुन्तीदेवीको सहारा देकर बैठाया और पृथ्वीपर पड़ी हुई अपनी बुआको वे सान्त्वना देने लगे ।। २९ ।। इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि परीक्षिञ्जन्मकथने षट्षष्टितमोऽध्यायः ।। ६६ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें परीक्षित्के जन्मका वर्णनविषयक छाछठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ६६ ।।