अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टषष्टितमोऽध्यायः श्रीकृष्णका प्रसूतिगृहमें प्रवेश, उत्तराका विलाप और अपने पुत्रको जीवित करनेके लिये प्रार्थना वैशम्पायन उवाच एवमुक्तस्तु राजेन्द्र केशिहा दुःखमूर्च्छितः । तथेति व्याजहारोच्चैर्ह्लादयन्निव तं जनम् ॥ १ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—राजेन्द्र! सुभद्राके ऐसा कहनेपर केशिहन्ता केशव दुःखसे व्याकुल हो उसे प्रसन्न करते हुए-से उच्च स्वरमें बोले—'बहिन! ऐसा ही होगा' ॥ १ ॥ वाक्येनेतेन हि तदा तं जनं पुरुषर्षभः । ह्लादयामास स विभुर्घर्मातं सलिलैरिव ॥ २ ॥ जैसे धूपसे तपे हुए मनुष्यको जलसे नहला देनेपर बड़ी शान्ति मिल जाती है, उसी प्रकार पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्णने इस अमृतमय वचनके द्वारा सुभद्रा तथा अन्तःपुरकी दूसरी स्त्रियोंको महान् आह्लाद प्रदान किया ॥ २ ॥ ततः स प्राविशत् तूर्णं जन्मवेश्म पितुस्तव । अर्चितं पुरुषव्याघ्र सितैर्माल्यैर्यथाविधि ॥ ३ ॥ पुरुषसिंह! तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्ण तुरंत ही तुम्हारे पिताके जन्मस्थान— सूतिकागारमें गये; जो सफेद फूलोंकी मालाओंसे विधिपूर्वक सजाया गया था ॥ ३ ॥ अपां कुम्भैः सुपूर्णैश्च विन्यस्तैः सर्वतोदिशम् । घृतेन तिन्दुकालातैः सर्षपैश्च महाभुज ॥ ४ ॥ महाबाहो! उसके चारों ओर जलसे भरे हुए कलश रखे गये थे। घीसे तर किये हुए तेन्दुक नामक काष्ठके कई टुकड़े जल रहे थे तथा यत्र-तत्र सरसों बिखेरी गयी थी ॥ ४ ॥ अस्त्रैश्च विमलैर्न्यस्तैः पावकैश्च समन्ततः । वृद्धाभिश्चापि रामाभिः परिचारार्थमावृतम् ॥ ५ ॥ दक्षैश्च परितो धीर भिषग्भिः कुशलैस्तथा । धैर्यशाली राजन्! उस घरके चारों ओर चमकते हुए तेज हथियार रखे गये थे और सब ओर आग प्रज्वलित की गयी थी। सेवाके लिये उपस्थित हुई बूढ़ी स्त्रियोंने उस स्थानको घेर रखा था तथा अपने-अपने कार्यमें कुशल चतुर चिकित्सक भी चारों ओर मौजूद थे ॥ ५½ ॥ ददर्श च स तेजस्वी रक्षोघ्नान्यपि सर्वशः ॥ ६ ॥ द्रव्याणि स्थापितानि स्म विधिवत् कुशलैर्जनैः ।