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अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

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वृष्णिवंशके प्रमुख वीरोंने जब सुना कि पाण्डव लोग नगरके समीप आ गये हैं, तब वे उनकी अगवानीके लिये बाहर निकले ।। १४ ।। अलंचक्रुश्च माल्यौघैः पुरुषा नागसाह्वयम् । पताकाभिर्विचित्राभिर्ध्वजैश्च विविधैरपि ।। १५ ।। पुरवासी मनुष्योंने फूलोंकी मालाओं, वन्दनवारों, भाँति-भाँतिकी ध्वजाओं तथा विचित्र-विचित्र पताकाओंसे हस्तिनापुरको सजाया था ।। १५ ।। वेश्मानि समलंचक्रुः पौराश्चापि जनेश्वर । देवतायतनानां च पूजाः सुविविधास्तथा ।। १६ ।। संदिदेशाथ विदुरः पाण्डुपुत्रप्रियेप्सया । राजमार्गाश्च तत्रासन् सुमनोभिरलंकृताः ।। १७ ।। नरेश्वर! नागरिकोंने अपने-अपने घरोंकी भी सजावट की थी। विदुरजीने पाण्डवोंका प्रिय करनेकी इच्छासे देवमन्दिरोंमें विविध प्रकारसे पूजा करनेकी आज्ञा दी। हस्तिनापुरके सभी राजमार्ग फूलोंसे अलंकृत किये गये थे ।। १६-१७ ।। शुशुभे तत्पुरं चापि समुद्रौघनिभस्वनम् । नर्तकैश्चापि नृत्यद्भिर्गायकानां च निःस्वनैः ।। १८ ।। नाचते हुए नर्तकों और गानेवाले गायकोंके शब्दोंसे उस नगरकी बड़ी शोभा हो रही थी। वहाँ समुद्रकी जलराशिकी गर्जनाके समान कोलाहल हो रहा था ।। १८ ।। आसीद् वैश्रवणस्येव निवासस्तत्पुरं तदा । वन्दिभिश्च नरै राजन् स्त्रीसहायैश्च सर्वशः ।। १९ ।। तत्र तत्र विविक्तेषु समन्तादुपशोभितम् । पताका धूयमानाश्च समन्तान्मातरिश्वना ।। २० ।। अदर्शयन्निव तदा कुरून् वै दक्षिणोत्तरान् । राजन्! उस समय वह नगर कुबेरकी अलकापुरीके समान प्रतीत होता था। वहाँ सब ओर एकान्त स्थानोंमें स्त्रियोंसहित बंदीजन खड़े थे, जिनसे उस पुरीकी शोभा बढ़ गयी थी। उस समय हवाके झोंकेसे नगरमें सब ओर पताकाएँ फहरा रही थीं, जो दक्षिण और उत्तर कुरु नामक देशोंकी शोभा दिखाती थीं ।। १९-२०३/२ ।। अघोषयंस्तदा चापि पुरुषा राजधूर्गताः । सर्वराष्ट्रविहारोऽद्य रत्नाभरणलक्षणः ।। २१ ।। राज-काज सँभालनेवाले पुरुषोंने सब ओर यह घोषणा करा दी कि आज समूचे राष्ट्रमें उत्सव मनाया जाय और सब लोग रत्नोंके आभूषण या उत्तमोत्तम गहने-कपड़े पहनकर इस उत्सवमें सम्मिलित हों ।। २१ ।।