अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकसप्ततितमोऽध्यायः भगवान् श्रीकृष्ण और उनके साथियोंद्वारा पाण्डवोंका स्वागत, पाण्डवोंका नगरमें आकर सबसे मिलना और व्यासजी तथा श्रीकृष्णका युधिष्ठिरको यज्ञके लिये आज्ञा देना वैशम्पायन उवाच तान् समीपगतान् श्रुत्वा पाण्डवान् शत्रुकर्शनः । वासुदेवः सहामात्यः प्रययौ ससुहृद्गणः ॥ १ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! पाण्डवोंके समीप आनेका समाचार सुनकर शत्रुसूदन भगवान् श्रीकृष्ण अपने मित्रों और मन्त्रियोंके साथ उनसे मिलनेके लिये चले ॥ १ ॥ ते समेत्य यथान्यायं प्रत्युद्याता दिदृक्षया । ते समेत्य यथाधर्मं पाण्डवा वृष्णिभिः सह ॥ २ ॥ विविशुः सहिता राजन् पुरं वारणसाह्वयम् । उन सब लोगोंने पाण्डवोंसे मिलनेके लिये आगे बढ़कर उनकी अगवानी की और सब यथायोग्य एक-दूसरेसे मिले। राजन्! धर्मानुसार पाण्डव वृष्णियोंसे मिलकर सब एक साथ हो हस्तिनापुरमें प्रविष्ट हुए ॥ २ १/२ ॥ महतस्तस्य सैन्यस्य खुरनेमिस्वनेन ह ॥ ३ ॥ द्यावापृथिव्योः खं चैव सर्वमासीत् समावृतम् । उस विशाल सेनाके घोड़ोंकी टापों और रथके पहियोंकी घरघराहटके तुमुल घोषसे पृथ्वी और स्वर्गके बीचका सारा आकाश व्याप्त हो गया था ॥ ३ १/२ ॥ ते कोशानग्रतः कृत्वा विविशुः स्वपुरं तदा ॥ ४ ॥ पाण्डवाः प्रीतमनसः सामात्याः ससुहृद्गणाः । वे खजानेको आगे करके अपनी राजधानीमें घुसे। उस समय मन्त्रियों एवं सुहृदोंसहित समस्त पाण्डवोंका मन प्रसन्न था ॥ ४ १/२ ॥ ते समेत्य यथान्यायं धृतराष्ट्रं जनाधिपम् ॥ ५ ॥ कीर्तयन्तः स्वनामानि तस्य पादौ ववन्दिरे । वे यथायोग्य सबसे मिलकर राजा धृतराष्ट्रके पास गये। अपना-अपना नाम बताते हुए उनके चरणोंमें प्रणाम करने लगे ॥ ५ १/२ ॥ धृतराष्ट्रादनु च ते गान्धारीं सुबलात्मजाम् ॥ ६ ॥