अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 287, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ें'मुनिश्रेष्ठ! मैं चाहता हूँ कि इसके लिये आपकी आज्ञा प्राप्त हो जाय, क्योंकि हम सब लोग आप और महात्मा श्रीकृष्णके अधीन हैं' ।। १४ ।। व्यास उवाच अनुजानामि राजंस्त्वां क्रियतां यदनन्तरम् । यजस्व वाजिमेधेन विधिवत् दक्षिणावता ।। १५ ।। व्यासजीने कहा—राजन्! मैं तुम्हें यज्ञके लिये आज्ञा देता हूँ। अब इसके बाद जो भी आवश्यक कार्य हो, उसे आरम्भ करो। विधिपूर्वक दक्षिणा देते हुए अश्वमेध यज्ञका अनुष्ठान करो ।। १५ ।। अश्वमेधो हि राजेन्द्र पावनः सर्वपाप्मनाम् । तेनेष्ट्वा त्वं विपाप्मा वै भविता नात्र संशयः ।। १६ ।। राजेन्द्र! अश्वमेधयज्ञ समस्त पापोंका नाश करके यजमानको पवित्र बनानेवाला है। उसका अनुष्ठान करके तुम पापसे मुक्त हो जाओगे, इसमें संशय नहीं है ।। १६ ।। वैशम्पायन उवाच इत्युक्तः स तु धर्मात्मा कुरुराजो युधिष्ठिरः । अश्वमेधस्य कौरव्य चकाराहरणे मतिम् ।। १७ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं—कुरुनन्दन! व्यासजीके ऐसा कहनेपर धर्मात्मा कुरुराज युधिष्ठिरने अश्वमेधयज्ञ आरम्भ करनेका विचार किया ।। १७ ।। समनुज्ञाप्य तत् सर्वं कृष्णद्वैपायनं नृपः । वासुदेवमथाभ्येत्य वाग्मी वचनमब्रवीत् ।। १८ ।। श्रीकृष्णद्वैपायन व्याससे सब बातोंके लिये आज्ञा ले प्रवचनकुशल राजा युधिष्ठिर भगवान् श्रीकृष्णके पास जाकर इस प्रकार बोले— ।। १८ ।। देवकी सुप्रजा देवी त्वया पुरुषसत्तम । यद् ब्रूयां त्वां महाबाहो तत् कृथास्त्वमिहाच्युत ।। १९ ।। 'पुरुषोत्तम! महाबाहु अच्युत! आपको ही पाकर देवकीदेवी उत्तम संतानवाली मानी गयी हैं। मैं आपसे जो कुछ कहूँ, उसे आप यहाँ सम्पन्न करें ।। १९ ।। त्वत्प्रभावाजितान् भोगानश्रीम यदुनन्दन । पराक्रमेण बुद्ध्या च त्वयेयं निर्जिता मही ।। २० ।। 'यदुनन्दन! हम आपके ही प्रभावसे प्राप्त हुई इस पृथ्वीका उपभोग कर रहे हैं। आपने ही अपने पराक्रम और बुद्धिबलसे इस सम्पूर्ण पृथ्वीको जीता है ।। २० ।। दीक्षयस्व त्वमात्मानं त्वं हि नः परमो गुरुः । त्वयीष्टवति दाशार्ह विपाप्मा भविता ह्यहम् ।। २१ ।।