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अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

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युधिष्ठिरने कहा—ब्रह्मन्! यह घोड़ा उपस्थित है। इसे किस प्रकार छोड़ा जाय, जिससे यह समूची पृथ्वीपर इच्छानुसार घूम आवे। इसकी व्यवस्था आप ही कीजिये तथा मुने! यह भी बताइये कि भूमण्डलमें इच्छानुसार घूमनेवाले इस घोड़ेकी रक्षा कौन करे? ।। १२-१३ ।। वैशम्पायन उवाच इत्युक्तः स तु राजेन्द्र कृष्णद्वैपायनोऽब्रवीत् । भीमसेनादवरजः श्रेष्ठः सर्वधनुष्मताम् ।। १४ ।। जिष्णुः सहिष्णुर्धृष्णुश्च स एनं पालयिष्यति । शक्तः स हि महीं जेतुं निवातकवचान्तकः ।। १५ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं—राजेन्द्र! युधिष्ठिरके इस तरह पूछनेपर श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासने कहा—'राजन्! अर्जुन सब धनुर्धारियोंमें श्रेष्ठ हैं। वे विजयमें उत्साह रखनेवाले, सहनशील और धैर्यवान् हैं; अतः वे ही इस घोड़ेकी रक्षा करेंगे। उन्होंने निवातकवचोंका नाश किया था। वे सम्पूर्ण भूमण्डलको जीतनेकी शक्ति रखते हैं ।। १४-१५ ।। तस्मिन् ह्यस्त्राणि दिव्यानि दिव्यं संहननं तथा । दिव्यं धनुश्चेषुधी च स एनमनुयास्यति ।। १६ ।। 'उनके पास दिव्य अस्त्र, दिव्य कवच, दिव्य धनुष और दिव्य तरकस हैं; अतः वे ही इस घोड़ेके पीछे-पीछे जायँगे ।। १६ ।। स हि धर्मार्थकुशलः सर्वविद्याविशारदः । यथाशास्त्रं नृपश्रेष्ठ चारयिष्यति ते हयम् ।। १७ ।। 'नृपश्रेष्ठ! वे धर्म और अर्थमें कुशल तथा सम्पूर्ण विद्याओंमें प्रवीण हैं, इसलिये आपके यज्ञ-सम्बन्धी अश्वका शास्त्रीय विधिके अनुसार संचालन करेंगे ।। १७ ।। राजपुत्रो महाबाहुः श्यामो राजीवलोचनः । अभिमन्योः पिता वीरः स एनं पालयिष्यति ।। १८ ।। 'जिनकी बड़ी-बड़ी भुजाएँ हैं, श्याम वर्ण है, कमल-जैसे नेत्र हैं, वे अभिमन्युके वीर पिता राजपुत्र अर्जुन इस घोड़ेकी रक्षा करेंगे ।। १८ ।। भीमसेनोऽपि तेजस्वी कौन्तेयोऽमितविक्रमः । समर्थो रक्षितुं राष्ट्रं नकुलश्च विशाम्पते ।। १९ ।। 'प्रजानाथ! कुन्तीकुमार भीमसेन भी अत्यन्त तेजस्वी और अमितपराक्रमी हैं। नकुलमें भी वे ही गुण हैं। ये दोनों ही राज्यकी रक्षा करनेमें पूर्ण समर्थ हैं (अतः वे ही राज्यके कार्य देखें) ।। १९ ।। सहदेवस्तु कौरव्य समाधास्यति बुद्धिमान् । कुटुम्बतन्त्रं विधिवत् सर्वमेव महायशाः ।। २० ।।