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अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

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(अनुगीतापर्व) षोडशोऽध्यायः अर्जुनका श्रीकृष्णसे गीताका विषय पूछना और श्रीकृष्णका अर्जुनसे सिद्ध, महर्षि एवं काश्यपका संवाद सुनाना जनमेजय उवाच सभायां वसतोस्तत्र निहत्यारीन् महात्मनोः । केशवार्जुनयोः का नु कथा समभवद् द्विज ।। १ ।। जनमेजयने पूछा—ब्रह्मन्! शत्रुओंका नाश करके जब महात्मा श्रीकृष्ण और अर्जुन सभाभवनमें रहने लगे, उन दिनों उन दोनोंमें क्या-क्या बातचीत हुई? ।। १ ।। वैशम्पायन उवाच कृष्णेन सहितः पार्थः स्वं राज्यं प्राप्य केवलम् । तस्यां सभायां दिव्यायां विजहार मुदा युतः ।। २ ।। वैशम्पायनजीने कहा—राजन्! श्रीकृष्णके सहित अर्जुनने जब केवल अपने राज्यपर पूरा अधिकार प्राप्त कर लिया, तब वे उस दिव्य सभाभवनमें आनन्दपूर्वक रहने लगे ।। २ ।। तत्र कंचित् सभोद्देशं स्वर्गोद्देशसमं नृप । यदृच्छया तौ मुदितौ जग्मतुः स्वजनावृतौ ।। ३ ।। नरेश्वर! एक दिन वहाँ स्वजनोंसे घिरे हुए वे दोनों मित्र स्वेच्छासे घूमते-घामते सभामण्डपके एक ऐसे भागमें पहुँचे, जो स्वर्गके समान सुन्दर था ।। ३ ।। ततः प्रतीतः कृष्णेन सहितः पाण्डवोऽर्जुनः । निरीक्ष्य तां सभां रम्यामिदं वचनमब्रवीत् ।। ४ ।। पाण्डुनन्दन अर्जुन भगवान् श्रीकृष्णके साथ रहकर बहुत प्रसन्न थे। उन्होंने एक बार उस रमणीय सभाकी ओर दृष्टि डालकर भगवान् श्रीकृष्णसे कहा— ।। ४ ।। विदितं मे महाबाहो संग्रामे समुपस्थिते । माहात्म्यं देवकीमातस्तच्च ते रूपमैश्वरम् ।। ५ ।।