भारतकोश
अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

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पृष्ठ 300

चतुःसप्ततितमोऽध्यायः

अर्जुनके द्वारा त्रिगतोंकी पराजय

वैशम्पायन उवाच त्रिगर्तैरभवद् युद्धं कृतवैरैः किरीटिनः । महारथसमाज्ञातैर्हतानां पुत्रनप्तृभिः ॥ १ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! कुरुक्षेत्रके युद्धमें जो त्रिगर्त वीर मारे गये थे, उनके महारथी पुत्रों और पौत्रोंने किरीटधारी अर्जुनके साथ वैर बाँध लिया था। त्रिगर्तदेशमें जानेपर अर्जुनका उन त्रिगर्तोंके साथ घोर युद्ध हुआ था ॥ १ ॥ ते समाज्ञाय सम्प्राप्तं यज्ञियं तुरगोत्तमम् । विषयान्तं ततो वीरा दंशिताः पर्यवारयन् ॥ २ ॥ रथिनो बद्धतूणीराः सदश्वैः समलंकृतैः । परिवार्य हयं राजन् ग्रहीतुं सम्प्रचक्रमुः ॥ ३ ॥ ‘पाण्डवोंका यज्ञसम्बन्धी उत्तम अश्व हमारे राज्यकी सीमामें आ पहुँचा है’ यह जानकर त्रिगर्तवीर कवच आदिसे सुसज्जित हो पीठपर तरकस बाँधे सजे-सजाये अच्छे घोड़ोंसे जुते हुए रथपर बैठकर निकले और उस अश्वको उन्होंने चारों ओरसे घेर लिया। राजन्! घोड़ेको घेरकर वे उसे पकड़नेका उद्योग करने लगे ॥ २-३ ॥ ततः किरीटी संचिन्त्य तेषां तत्र चिकीर्षितम् । वारयामास तान् वीरान् सान्त्वपूर्वमरिंदमः ॥ ४ ॥ शत्रुओंका दमन करनेवाले अर्जुन यह जान गये कि वे क्या करना चाहते हैं। उनके मनोभावका विचार करके वे उन्हें शान्तिपूर्वक समझाते हुए युद्धसे रोकने लगे ॥ ४ ॥ तदनादृत्य ते सर्वे शरैरभ्यहनंस्तदा । तमोरजोभ्यां संछन्नांस्तान् किरीटी न्यवारयत् ॥ ५ ॥ किंतु वे सब उनकी बातकी अवहेलना करके उन्हें बाणोंद्वारा चोट पहुँचाने लगे। तमोगुण और रजोगुणके वशीभूत हुए उन त्रिगर्तोंको किरीटीने युद्धसे रोकनेकी पूरी चेष्टा की ॥ ५ ॥ तानब्रवीत् ततो जिष्णुः प्रहसन्निव भारत । निवर्तध्वमधर्मज्ञाः श्रेयो जीवितमेव च ॥ ६ ॥ भारत! तदनन्तर विजयशील अर्जुन हँसते हुए-से बोले—‘धर्मको न जाननेवाले पाप्पात्माओ! लौट जाओ। जीवनकी रक्षामें ही तुम्हारा कल्याण है’ ॥ ६ ॥ स हि वीरः प्रयास्यन् वै धर्मराजेन वारितः । हतबान्धवा न ते पार्थ हन्तव्याः पार्थिवा इति ॥ ७ ॥