अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदिशोऽभिदुद्रुवू राजन् धनंजयशरार्दिताः ॥ ३१ ॥ राजन्! धनंजयके बाणोंसे पीड़ित हुए समस्त त्रिगर्तदेशीय महारथियोंका युद्धविषयक उत्साह नष्ट हो गया; अतः वे चारों दिशाओंमें भाग चले ॥ ३१ ॥ तमूचुः पुरुषव्याघ्रं संशप्तकनिषूदनम् । तवास्म किंकराः सर्वे सर्वे वै वशगास्तव ॥ ३२ ॥ उनमेंसे कितने ही संशप्तकसूदन पुरुषसिंह अर्जुनसे इस प्रकार कहने लगे —'कुन्तीनन्दन! हम सब आपके आज्ञाकारी सेवक हैं और सभी सदा आपके अधीन रहेंगे ॥ ३२ ॥ आज्ञापयस्व नः पार्थ प्रह्वान् प्रेष्यानवस्थितान् । करिष्यामः प्रियं सर्वं तव कौरवनन्दन ॥ ३३ ॥ 'पार्थ! हम सभी सेवक विनीत भावसे आपके सामने खड़े हैं। आप हमें आज्ञा दें। कौरवनन्दन! हम सब लोग आपके समस्त प्रिय कार्य सदा करते रहेंगे' ॥ ३३ ॥ एतदाज्ञाय वचनं सर्वांस्तानब्रवीत् तदा । जीवितं रक्षत नृपाः शासनं प्रतिगृह्यताम् ॥ ३४ ॥ उनकी ये बातें सुनकर अर्जुनने उनसे कहा—'राजाओ! अपने प्राणोंकी रक्षा करो। इसका एक ही उपाय है, हमारा शासन स्वीकार कर लो' ॥ ३४ ॥ इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि त्रिगर्तपराभवे चतुःसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७४ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें त्रिगर्तोंकी पराजयविषयक चौहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७४ ॥