अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंततो मृगमिवाकाशे यथा देवः पिनाकधृक् । ससार तं तथा वीरो विधिवद् यज्ञियं हयम् ॥ ४७ ॥ जैसे पिनाकधारी महादेवजी आकाशमें मृगके पीछे दौड़े थे, उसी प्रकार वीर अर्जुनने उस यज्ञसम्बन्धी घोड़ेका विधिपूर्वक अनुसरण किया ॥ ४७ ॥ स च वाजी यथेष्टेन तांस्तान् देशान् यथाक्रमम् । विचचार यथाकामं कर्म पार्थस्य वर्धयन् ॥ ४८ ॥ वह अश्व यथेष्टगतिसे क्रमशः सभी देशोंमें घूमता और अर्जुनके पराक्रमका विस्तार करता हुआ इच्छानुसार विचरने लगा ॥ ४८ ॥ क्रमेण स हयस्त्वेवं विचरन् पुरुषर्षभ । मणिपूरपतेर्देशमुपायात् सहपाण्डवः ॥ ४९ ॥ पुरुषप्रवर जनमेजय! इस प्रकार क्रमशः विचरण करता हुआ वह अश्व अर्जुनसहित मणिपुर-नरेशके राज्यमें जा पहुँचा ॥ ४९ ॥ इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि सैन्धवपराजये अष्टसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७८ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें सैन्धवोंकी पराजयविषयक अठहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७८ ॥