अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें‘राजन्! तुम इनके पुत्र हो। ये शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले कुरुकुलतिलक अर्जुन संग्राममें जूझते हुए तुम-जैसे बेटेका बल-पराक्रम जानना चाहते थे। वत्स! इसीलिये मैंने तुम्हें युद्धके लिये प्रेरित किया है। सामर्थ्यशाली पुत्र! तुम अपनेमें अणुमात्र पापकी भी आशंका न करो ।। ४६-४७ ।। ऋषिरेष महानात्मा पुराणः शाश्वतोऽक्षरः । नैनं शक्तो हि संग्रामे जेतुं शक्रोऽपि पुत्रक ।। ४८ ।। ‘ये महात्मा नर पुरातन ऋषि, सनातन एवं अविनाशी हैं। बेटा! युद्धमें इन्हें इन्द्र भी नहीं जीत सकते ।। ४८ ।। अयं तु मे मणिर्दिव्यः समानीतो विशाम्पते । मृतान् मृतान् पन्नगेन्द्रान् यो जीवयति नित्यदा ।। ४९ ।। एनमस्योरसि त्वं च स्थापयस्व पितुः प्रभो । संजीवितं तदा पार्थं स त्वं द्रष्टासि पाण्डवम् ।। ५० ।। ‘प्रजानाथ! मैं यह दिव्यमणि ले आयी हूँ। यह सदा युद्धमें मरे हुए नागराजोंको जीवित किया करती है। प्रभो! तुम इसे लेकर अपने पिताकी छातीपर रख दो। फिर तुम पाण्डुपुत्र कुन्तीकुमार अर्जुनको जीवित हुआ देखोगे’ ।। ४९-५० ।। इत्युक्तः स्थापयामास तस्योरसि मणिं तदा । पार्थस्यामिततेजाः स पितुः स्नेहादपापकृत् ।। ५१ ।। उलूपीके ऐसा कहनेपर निष्पाप कर्म करनेवाले अमित तेजस्वी बभ्रुवाहनने अपने पिता पार्थकी छातीपर स्नेहपूर्वक वह मणि रख दी ।। ५१ ।। तस्मिन् न्यस्ते मणौ वीरो जिष्णुरुज्जीवितः प्रभुः । चिरसुप्त इवोत्तस्थौ मृष्टलोहितलोचनः ।। ५२ ।। उस मणिके रखते ही शक्तिशाली वीर अर्जुन देरतक सोकर जगे हुए मनुष्यकी भाँति अपनी लाल आँखें मलते हुए पुनः जीवित हो उठे ।। ५२ ।। तमुत्थितं महात्मानं लब्धसंज्ञं मनस्विनम् । समीक्ष्य पितरं स्वस्थं ववन्दे बभ्रुवाहनः ।। ५३ ।। अपने मनस्वी पिता महात्मा अर्जुनको सचेत एवं स्वस्थ होकर उठा हुआ देख बभ्रुवाहनने उनके चरणोंमें प्रणाम किया ।। ५३ ।। उत्थिते पुरुषव्याघ्रे पुनर्लक्ष्मीवति प्रभो । दिव्याः सुमनसः पुण्या ववृषे पाकशासनः ।। ५४ ।। प्रभो! पुरुषसिंह श्रीमान् अर्जुनके पुनः उठ जानेपर पाकशासन इन्द्रने उनके ऊपर दिव्य एवं पवित्र फूलोंकी वर्षा की ।। ५४ ।। अनाहता दुन्दुभयो विनेदुर्मेघनिःस्वनाः । साधु साध्विति चाकाशे बभूव सुमहान् स्वनः ।। ५५ ।।