अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 340, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकाशीतितमोऽध्यायः उलूपीका अर्जुनके पूछनेपर अपने आगमनका कारण एवं अर्जुनकी पराजयका रहस्य बताना, पुत्र और पत्नीसे विदा लेकर पार्थका पुनः अश्वके पीछे जाना अर्जुन उवाच किमागमनकृत्यं ते कौरव्यकुलनन्दिनि । मणिपुरपतेर्मातुस्तथैव च रणाजिरे ॥ १ ॥ अर्जुन बोले—कौरव्य नामके कुलको आनन्दित करनेवाली उलूपी! इस रणभूमिमें तुम्हारे और मणिपुरनरेश बभ्रुवाहनकी माता चित्रांगदाके आनेका क्या कारण है? ॥ १ ॥ कच्चित् कुशलकामासि राज्ञोऽस्य भुजगात्मजे । मम वा चपलापाङ्गि कच्चित् त्वं शुभमिच्छसि ॥ २ ॥ नागकुमारी! तुम इस राजा बभ्रुवाहनका कुशल-मंगल तो चाहती हो न? चंचल कटाक्षवाली सुन्दरी! तुम मेरे कल्याणकी भी इच्छा रखती हो न? ॥ २ ॥ कच्चित् ते पृथुलश्रोणि नाप्रियं प्रियदर्शने । अकार्षमहमज्ञानादयं वा बभ्रुवाहनः ॥ ३ ॥ स्थूल नितम्बवाली प्रियदर्शने! मैंने या इस बभ्रुवाहनने अनजानमें तुम्हारा कोई अप्रिय तो नहीं किया है? ॥ ३ ॥ कच्चिन्नु राजपुत्री ते सपत्नी चैत्रवाहनी । चित्राङ्गदा वरारोहा नापराध्यति किंचन ॥ ४ ॥ तुम्हारी सौत चित्रवाहनकुमारी वरारोहा राजपुत्री चित्रांगदाने तो तुम्हारा कोई अपराध नहीं किया है? ॥ ४ ॥ तमुवाचोरगपतेर्दुहिता प्रहसन्निव । न मे त्वमपराद्धोऽसि न हि मे बभ्रुवाहनः ॥ ५ ॥ न जनित्री तथास्येयं मम या प्रेष्यवत् स्थिता । श्रूयतां यद् यथा चेदं मया सर्वं विचेष्टितम् ॥ ६ ॥ अर्जुनका यह प्रश्न सुनकर नागराजकन्या उलूपी हँसती हुई-सी बोली—‘प्राणवल्लभ! आपने या बभ्रुवाहनने मेरा कोई अपराध नहीं किया है। बभ्रुवाहनकी माताने भी मेरा कुछ नहीं बिगाड़ा है। यह तो सदा दासीकी भाँति मेरी आज्ञाके अधीन रहती है। यहाँ आकर मैंने जो-जो जिस प्रकार काम किया है, वह बतलाती हूँ; सुनिये ॥ ५-६ ॥ न मे कोपस्त्वया कार्यः शिरसा त्वां प्रसादये ।