भारतकोश
अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

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पृष्ठ 347

द्व्यशीतितमोऽध्यायः मगधराज मेघसन्धिकी पराजय वैशम्पायन उवाच स तु वाजी समुद्रान्तां पर्यत्य वसुधामिमाम् । निवृत्तोऽभिमुखो राजन् येन वारणसाह्वयम् ॥ १ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! इसके बाद वह घोड़ा समुद्रपर्यन्त सारी पृथ्वीकी परिक्रमा करके उस दिशाकी ओर मुँह करके लौटा, जिस ओर हस्तिनापुर था ॥ १ ॥ अनुगच्छंश्च तुरगं निवृत्तोऽथ किरीटभृत् । यदृच्छया समापेदे पुरं राजगृहं तदा ॥ २ ॥ किरीटधारी अर्जुन भी घोड़ेका अनुसरण करते हुए लौट पड़े और दैवेच्छासे राजगृह नामक नगरमें आ पहुँचे ॥ २ ॥ तमभ्याशगतं दृष्ट्वा सहदेवात्मजः प्रभो । क्षत्रधर्मे स्थितो वीरः समरायाजुहाव ह ॥ ३ ॥ प्रभो! अर्जुनको अपने नगरके निकट आया देख क्षत्रिय-धर्ममें स्थित हुए वीर सहदेवकुमार राजा मेघसन्धिने उन्हें युद्धके लिये आमन्त्रित किया ॥ ३ ॥ ततः पुरात् स निष्क्रम्य रथी धन्वी शरी तली । मेघसन्धिः पदातिं तं धनंजयमुपाद्रवत् ॥ ४ ॥ तत्पश्चात् स्वयं भी धनुष-बाण और दस्तानेसे सुसज्जित हो रथपर बैठकर नगरसे बाहर निकला। मेघसन्धिने पैदल आते हुए धनंजयपर धावा किया ॥ ४ ॥ आसाद्य च महातेजा मेघसन्धिर्धनंजयम् । बालभावान्महाराज प्रोवाचेदं न कौशलात् ॥ ५ ॥ महाराज! धनंजयके पास पहुँचकर महातेजस्वी मेघसन्धिने बुद्धिमानीके कारण नहीं, मूर्खतावश निम्नांकित बात कही— ॥ ५ ॥ किमयं चार्यते वाजी स्त्रीमध्य इव भारत । हयमेनं हरिष्यामि प्रयतस्व विमोक्षणे ॥ ६ ॥ 'भरतनन्दन! इस घोड़ेके पीछे क्यों फिर रहे हो! यह तो ऐसा जान पड़ता है, मानो स्त्रियोंके बीच चल रहा हो। मैं इसका अपहरण कर रहा हूँ। तुम इसे छुड़ानेका प्रयत्न करो ॥ ६ ॥ अदत्तानुनयो युद्धे यदि त्वं पितृभिर्मम । करिष्यामि तवातिथ्यं प्रहर प्रहरामि च ॥ ७ ॥