भारतकोश
अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

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पृष्ठ 35

तस्मिँल्लीने प्रलीयेत समानो व्यान एव च । अपानप्राणयोर्मध्ये उदानो व्याप्य तिष्ठति । तस्माच्छयानं पुरुषं प्राणापानौ न मुञ्चतः ॥ १६ ॥ ‘समान और व्यान—इन दोनोंके बीचमें प्राण और अपान विचरते हैं। उस अपान्सहित प्राणके लीन होनेपर समान और व्यानका भी लय हो जाता है। अपान और प्राणके बीचमें उदान सबको व्याप्त करके स्थित होता है। इसीलिये सोये हुए पुरुषको प्राण और अपान नहीं छोड़ते हैं ॥ १५-१६ ॥ प्राणानामायतत्वेन तमुदानं प्रचक्षते । तस्मात् तपो व्यवस्यन्ति मद्गतं ब्रह्मवादिनः ॥ १७ ॥ ‘प्राणोंका आयतन (आधार) होनेके कारण उसे विद्वान् पुरुष उदान कहते हैं। इसलिये वेदवादी मुझमें स्थित तपका निश्चय करते हैं ॥ १७ ॥ तेषामन्योन्यभक्षाणां सर्वेषां देहचारिणाम् । अग्निर्वैश्वानरो मध्ये सप्तधा दीव्यतेऽन्तरा ॥ १८ ॥ ‘एक दूसरेके सहारे रहनेवाले तथा सबके शरीरोंमें संचार करनेवाले उन पाँचों प्राणवायुओंके मध्यभागमें जो समान वायुका स्थान नाभिमण्डल है, उसके बीचमें स्थित हुआ वैश्वानर अग्नि सात रूपोंमें प्रकाशमान है ॥ १८ ॥ घ्राणं जिह्वा च चक्षुश्च त्वक् च श्रोत्रं च पञ्चमम् । मनो बुद्धिश्च सप्तैता जिह्वा वैश्वानरार्चिषः ॥ १९ ॥ घ्रेयं दृश्यं च पेयं च स्पृश्यं श्रव्यं तथैव च । मन्तव्यमथ बोद्धव्यं ताः सप्त समिधो मम ॥ २० ॥ ‘घ्राण (नासिका), जिह्वा, नेत्र, त्वचा और पाँचवाँ कान एवं मन तथा बुद्धि—ये उस वैश्वानर अग्निकी सात जिह्वाएँ हैं। सूँघनेयोग्य गन्ध, दर्शनीय रूप, पीनेयोग्य रस, स्पर्श करनेयोग्य वस्तु, सुननेयोग्य शब्द, मनके द्वारा मनन करने और बुद्धिके द्वारा समझने योग्य विषय—ये सात मुझ वैश्वानरकी समिधाएँ हैं ॥ १९-२० ॥ घ्राता भक्षयिता द्रष्टा स्प्रष्टा श्रोता च पञ्चमः । मन्ता बोद्धा च सप्तैते भवन्ति परमर्त्विजः ॥ २१ ॥ ‘सूँघनेवाला, खानेवाला, देखनेवाला, स्पर्श करने-वाला, पाँचवाँ श्रवण करनेवाला एवं मनन करनेवाला और समझनेवाला—ये सात श्रेष्ठ ऋत्विज् हैं ॥ २१ ॥ घ्रेये पेये च दृश्ये च स्पृश्ये श्रव्ये तथैव च । मन्तव्येऽप्यथ बोद्धव्ये सुभगे पश्य सर्वदा ॥ २२ ॥ ‘सुभगे! सूँघनेयोग्य, पीनेयोग्य, देखनेयोग्य, स्पर्श करनेयोग्य, सुनने, मनन करने तथा समझनेयोग्य विषय—इन सबके ऊपर तुम सदा दृष्टिपात करो (इनमें हविष्य-बुद्धि करो) ॥ २२ ॥