अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 366, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंषडशीतितमोऽध्यायः राजा युधिष्ठिरका भीमसेनको राजाओंकी पूजा करनेका आदेश और श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे अर्जुनका संदेश कहना वैशम्पायन उवाच समागतान् वेदविदो राज्ञश्च पृथिवीश्वरान् । दृष्ट्वा युधिष्ठिरो राजा भीमसेनमभाषत ॥ १ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! वहाँ आये हुए वेदवेत्ता विद्वानों और पृथ्वीका शासन करनेवाले राजाओंको देखकर राजा युधिष्ठिरने भीमसेनसे कहा— ॥ १ ॥ उपयाता नरव्याघ्रा य एते पृथिवीश्वराः । एतेषां क्रियतां पूजा पूजार्हा हि नराधिपाः ॥ २ ॥ 'भाई! ये जो भूमण्डलका शासन करनेवाले राजा यहाँ पधारे हुए हैं, सभी पुरुषोंमें श्रेष्ठ एवं पूजाके योग्य हैं; अतः तुम इनकी यथोचित पूजा (सत्कार) करो' ॥ २ ॥ इत्युक्तः स तथा चक्रे नरेन्द्रेण यशस्विना । भीमसेनो महातेजा यमाभ्यां सह पाण्डवः ॥ ३ ॥ यशस्वी महाराजके इस प्रकार आदेश देनेपर महातेजस्वी पाण्डुपुत्र भीमसेनने नकुल और सहदेवको साथ लेकर सब राजाओंका युधिष्ठिरके आज्ञानुसार यथोचित सत्कार किया ॥ ३ ॥ अथाभ्यगच्छद्गोविन्दो वृष्णिभिः सह धर्मजम् । बलदेवं पुरस्कृत्य सर्वप्राणभृतां वरः ॥ ४ ॥ युयुधानेन सहितः प्रद्युम्नेन गदेन च । निशठेनाथ साम्बेन तथैव कृतवर्मणा ॥ ५ ॥ इसके बाद समस्त प्राणियोंमें श्रेष्ठ भगवान् श्रीकृष्ण बलदेवजीको आगे करके सात्यकि, प्रद्युम्न, गद, निशठ, साम्ब तथा कृतवर्मा आदि वृष्णिवंशियोंके साथ युधिष्ठिरके पास आये ॥ ४-५ ॥ तेषामपि परां पूजां चक्रे भीमो महारथः । विविशुस्ते च वेश्मानि रत्नवन्ति च सर्वशः ॥ ६ ॥ महारथी भीमसेनने उन लोगोंका भी विधिवत् सत्कार किया। फिर वे रत्नोंसे भरे-पूरे घरोंमें जाकर रहने लगे ॥ ६ ॥ युधिष्ठिरसमीपे तु कथान्ते मधुसूदनः । अर्जुनं कथयामास बहुसंग्रामकर्षितम् ॥ ७ ॥