अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 368, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंदीजियेगा ।। १४ ।। आगमिष्यन्ति राजानः सर्वे वै कौरवर्षभ । प्राप्तानां महतां पूजा कार्या ह्येतत् क्षमं हि नः ।। १५ ।। "(अर्जुन कहते हैं—) 'कौरवश्रेष्ठ! अश्वमेधयज्ञमें प्रायः सभी राजा पधारेंगे। जो आ जायँ उन सबको महान् मानकर उन सबका पूर्ण सत्कार करना चाहिये। यही हमारे योग्य कार्य है ।। १५ ।। इत्येतद्वचनाद् राजा विज्ञाप्यो मम मानद । यथा चात्ययिकं न स्याद् यदर्घ्याहरणेऽभवत् ।। १६ ।। ("इतना कहकर वे फिर मुझसे बोले—) 'मानद! मेरी ओरसे तुम राजा युधिष्ठिरको यह सूचित कर देना कि राजसूय-यज्ञमें अर्घ्य देते समय जो दुर्घटना हो गयी थी, वैसी इस बार नहीं होनी चाहिये ।। १६ ।। कर्तुमर्हति तद् राजा भवांश्चाप्यनुमन्यताम् । राजद्वेषान्न नश्येयुरिमा राजन् पुनः प्रजाः ।। १७ ।। "श्रीकृष्ण! राजा युधिष्ठिरको ऐसा ही करना चाहिये। आप भी उन्हें ऐसी ही अनुमति दें और बतावें कि 'राजन्! राजाओंके पारस्परिक द्वेषसे पुनः इन सारी प्रजाओंका विनाश न होने पावे' ।। १७ ।। इदमन्यच्च कौन्तेय वचः स पुरुषोऽब्रवीत् । धनंजयस्य नृपते तन्मे निगदतः शृणु ।। १८ ।। (श्रीकृष्ण कहते हैं—) 'कुन्तीनन्दन नरेश्वर! उस मनुष्यने अर्जुनकी कही हुई यह एक बात और बतायी थी, उसे भी मेरे मुँहसे सुन लीजिये ।। १८ ।। उपायास्यति यज्ञं नो मणिपूरपतिर्नृपः । पुत्रो मम महातेजा दयितो बभ्रुवाहनः ।। १९ ।। "हमलोगोंके इस यज्ञमें मणिपुरका राजा बभ्रुवाहन भी आवेगा, जो महान् तेजस्वी और मेरा परम प्रिय पुत्र है ।। १९ ।। तं भवान् मदपेक्षार्थं विधिवत् प्रतिपूजयेत् । स तु भक्तोऽनुरक्तश्च मम नित्यमिति प्रभो ।। २० ।। "प्रभो! उसकी सदा मेरे प्रति बड़ी भक्ति और अनुरक्ति रहती है। इसलिये आप मेरी अपेक्षासे उसका विधिपूर्वक विशेष सत्कार करें" ।। २० ।। इत्येतद् वचनं श्रुत्वा धर्मराजो युधिष्ठिरः । अभिनन्द्यास्य तद् वाक्यमिदं वचनमब्रवीत् ।। २१ ।। अर्जुनका यह संदेश सुनकर धर्मराज युधिष्ठिरने उसका हृदयसे अभिनन्दन किया और इस प्रकार कहा ।।