अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 370, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्ताशीतितमोऽध्यायः अर्जुनके विषयमें श्रीकृष्ण और युधिष्ठिरकी बातचीत, अर्जुनका हस्तिनापुरमें जाना तथा उलूपी और चित्राङ्गदाके साथ बभ्रुवाहनका आगमन युधिष्ठिर उवाच श्रुतं प्रियमिदं कृष्ण यत् त्वमर्हसि भाषितुम् । तन्मेऽमृतरसं पुण्यं मनो ह्लादयति प्रभो ॥ १ ॥ युधिष्ठिर बोले—प्रभो! श्रीकृष्ण! मैंने यह प्रिय संदेश सुना, जिसे आप ही कहने या सुनानेके योग्य हैं। आपका यह अमृतरससे परिपूर्ण पवित्र वचन मेरे मनको आनन्दमग्न किये देता है ॥ १ ॥ बहूनि किल युद्धानि विजयस्य नराधिपैः । पुनरासन् हृषीकेश तत्र तत्र च मे श्रुतम् ॥ २ ॥ हृषीकेश! मेरे सुननेमें आया है कि भिन्न-भिन्न देशोंमें वहाँके राजाओंके साथ अर्जुनको कई बार युद्ध करने पड़े हैं ॥ २ ॥ किं निमित्तं स नित्यं हि पार्थः सुखविवर्जितः । अतीव विजयो धीमन्निति मे दूयते मनः ॥ ३ ॥ संचिन्तयामि कौन्तेयं रहो जिष्णुं जनार्दन । अतीव दुःखभागी स सततं पाण्डुनन्दनः ॥ ४ ॥ इसका क्या कारण है? बुद्धिमान् जनार्दन! जब मैं एकान्तमें बैठकर अर्जुनके बारेमें विचार करता हूँ, तब यह जानकर मेरा मन खिन्न हो जाता है कि हमलोगोंमें वे ही सदा सबसे अधिक दुःखके भागी रहे हैं। पाण्डुनन्दन अर्जुन सुखसे वंचित क्यों रहते हैं? यह समझमें नहीं आता ॥ ३-४ ॥ किं नु तस्य शरीरेऽस्ति सर्वलक्षणपूजिते । अनिष्टं लक्षणं कृष्ण येन दुःखान्युपाश्नुते ॥ ५ ॥ श्रीकृष्ण! उनका शरीर तो सभी शुभलक्षणोंसे सम्पन्न है। फिर उसमें अशुभ लक्षण कौन-सा है, जिससे उन्हें अधिक दुःख उठाना पड़ता है? ॥ ५ ॥ अतीवासुखभोगी स सततं कुन्तिनन्दनः । न हि पश्यामि बीभत्सोर्निन्द्यं गात्रेषु किंचन । श्रोतव्यं चेन्मयैतद् वै तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ ६ ॥