अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंततोऽन्तरिक्षे वागासीत् साधु साध्विति भारत ॥ १५ ॥ तथैव द्विजसंघानां शंसतां विबभौ स्वनः । भारत! उस समय आकाशवाणी हुई—'पाण्डवो! तुमने बहुत अच्छा निश्चय किया। तुम्हें धन्यवाद!' इसी प्रकार पाण्डवोंके सत्साहसकी प्रशंसा करते हुए ब्राह्मण-समूहोंका भी शब्द वहाँ स्पष्ट सुनायी दे रहा था ॥ १५ १/२ ॥ द्वैपायनस्तथा कृष्णः पुनरेव युधिष्ठिरम् ॥ १६ ॥ प्रोवाच मध्ये विप्राणामिदं सम्पूजयन् मुनिः । तब मुनिवर द्वैपायनकृष्णने पुनः ब्राह्मणोंके बीचमें युधिष्ठिरकी प्रशंसा करते हुए कहा — ॥ १६ १/२ ॥ दत्तैषा भवता मह्यं तां ते प्रतिददाम्यहम् ॥ १७ ॥ हिरण्यं दीयतामेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो धरास्तु ते । 'राजन्! तुमने तो यह पृथ्वी मुझे दे ही दी। अब मैं अपनी ओरसे इसे वापस करता हूँ। तुम इन ब्राह्मणोंको सुवर्ण दे दो और पृथ्वी तुम्हारे ही अधिकारमें रह जाय' ॥ १७ १/२ ॥ ततोऽब्रवीद् वासुदेवो धर्मराजं युधिष्ठिरम् ॥ १८ ॥ यथाऽऽह भगवान् व्यासस्तथा त्वं कर्तुमर्हसि । तब भगवान् श्रीकृष्णने धर्मराज युधिष्ठिरसे कहा—'धर्मराज! भगवान् व्यास जैसा कहते हैं, वैसा ही तुम्हें करना चाहिये' ॥ १८ १/२ ॥ इत्युक्तः स कुरुश्रेष्ठः प्रीतात्मा भ्रातृभिः सह ॥ १९ ॥ कोटिकोटिकृतां प्रादाद् दक्षिणां त्रिगुणां क्रतोः । यह सुनकर कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिर भाइयोंसहित बहुत प्रसन्न हुए और प्रत्येक ब्राह्मणोंको उन्होंने यज्ञके लिये एक-एक करोड़की तिगुनी दक्षिणा दी ॥ १९ १/२ ॥ न करिष्यति तल्लोके कश्चिदन्यो नराधिपः ॥ २० ॥ यत् कृतं कुरुराजेन मरुत्तस्यानुकुर्वता । महाराज मरुत्तके मार्गका अनुसरण करनेवाले राजा युधिष्ठिरने उस समय जैसा महान् त्याग किया था, वैसा इस संसारमें दूसरा कोई राजा नहीं कर सकेगा ॥ २० १/२ ॥ प्रतिगृह्य तु तद् रत्नं कृष्णद्वैपायनो मुनिः ॥ २१ ॥ ऋत्विग्भ्यः प्रददौ विद्वांश्चतुर्धा व्यभजंश्च ते । विद्वान् महर्षि व्यासने वह सुवर्णराशि लेकर ब्राह्मणोंको दे दी और उन्होंने चार भाग करके उसे आपसमें बाँट लिया ॥ २१ १/२ ॥ धरण्या निष्क्रयं दत्त्वा तद्धिरण्यं युधिष्ठिरः ॥ २२ ॥ धूतपापो जितस्वर्गो मुमुदे भ्रातृभिः सह ।