अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभक्ष्यखाण्डवरागाणां क्रियतां भुज्यतां तथा । पशूनां बध्यतां चैव नान्तं ददृशिरे जनाः ॥ ४१ ॥ (पीपल और सोंठ मिलाकर जो मूँगका जूस तैयार किया जाता है, उसे 'खाण्डव' कहते हैं। उसीमें शक्कर मिला हुआ हो तो वह 'खाण्डवराग' कहा जाता है।) भक्ष्य-भोज्य पदार्थ और खाण्डवराग कितनी मात्रामें बनाये और खाये जाते हैं तथा कितने पशु वहाँ बाँधे हुए थे, इसकी कोई सीमा वहाँके लोगोंको नहीं दिखायी देती थी ।। ४१ ।। मत्तप्रमत्तमुदितं सुप्रीतयुवतीजनम् । मृदङ्गशङ्खनादैश्च मनोरममभूत् तदा ॥ ४२ ॥ उस यज्ञके भीतर आये हुए सब लोग मत्त-प्रमत्त और आनन्द विभोर हो रहे थे। युवतियाँ बड़ी प्रसन्नताके साथ वहाँ विचरण करती थीं। मृदंगों और शंखोंकी ध्वनियोंसे उस यज्ञशालाकी मनोरमता और भी बढ़ गयी थी ।। ४२ ।। दीयतां भुज्यतां चेष्टं दिवारात्रमवारितम् । तं महोत्सवसंकाशं हृष्टपुष्टजनाकुलम् ॥ ४३ ॥ कथयन्ति स्म पुरुषा नानादेशनिवासिनः । 'जिसकी जैसी इच्छा हो, उसको वही वस्तु दी जाय। सबको इच्छानुसार भोजन कराया जाय'—यह घोषणा दिन-रात जारी रहती थी—कभी बंद नहीं होती थी। हृष्ट-पुष्ट मनुष्योंसे भरे हुए उस यज्ञ-महोत्सवकी चर्चा नाना देशोंके निवासी मनुष्य बहुत दिनोंतक करते रहे ॥ ४३ १/२ ॥ वर्षित्वा धनधाराभिः कामै रत्नै रसैस्तथा । विपाप्मा भरतश्रेष्ठः कृतार्थः प्राविशत् पुरम् ॥ ४४ ॥ भरतश्रेष्ठ राजा युधिष्ठिरने उस यज्ञमें धनकी मूसलाधार वर्षा की। सब प्रकारकी कामनाओं, रत्नों और रसोंकी भी वर्षा की। इस प्रकार पापरहित और कृतार्थ होकर उन्होंने अपने नगरमें प्रवेश किया ।। ४४ ।। इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि अश्वमेधसमाप्तौ एकोननवतितमोऽध्यायः ॥ ८९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें अश्वमेधकी समाप्तिविषयक नवासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ८९ ।।