अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 398, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंपुत्र होनेका यही फल है कि वह वृद्धावस्थामें पिताकी रक्षा करे। ब्रह्मर्षे! तीनों लोकोंमें यह सनातन श्रुति प्रसिद्ध है ॥ ५८ ॥ प्राणधारणमात्रेण शक्यं कर्तुं तपस्त्वया । प्राणो हि परमो धर्मः स्थितो देहेषु देहिनाम् ॥ ५९ ॥ प्राणधारणमात्रसे आप तप कर सकते हैं। देहधारियोंके शरीरोंमें स्थित हुआ प्राण ही परम धर्म है ॥ ५९ ॥ पितोवाच अपि वर्षसहस्री त्वं बाल एव मतो मम । उत्पाद्य पुत्रं हि पिता कृतकृत्यो भवेत् सुतात् ॥ ६० ॥ पिताने कहा—बेटा! तुम हजार वर्षके हो जाओ तो भी हमारे लिये बालक ही हो। पिता पुत्रको जन्म देकर ही उससे अपनेको कृतकृत्य मानता है ॥ ६० ॥ बालानां क्षुद् बलवती जानाम्येतदहं प्रभो । वृद्धोऽहं धारयिष्यामि त्वं बली भव पुत्रक ॥ ६१ ॥ सामर्थ्यशाली पुत्र! मैं इस बातको अच्छी तरह जानता हूँ कि बच्चोंकी भूख बड़ी प्रबल होती है। मैं तो बूढ़ा हूँ। भूखे रहकर भी प्राण धारण कर सकता हूँ। तुम यह सत्तू खाकर बलवान् होओ—अपने प्राणोंकी रक्षा करो ॥ ६१ ॥ जीर्णेन वयसा पुत्र न मां क्षुद् बाधतेऽपि च । दीर्घकालं तपस्तप्तं न मे मरणतो भयम् ॥ ६२ ॥ बेटा! जीर्ण अवस्था हो जानेके कारण मुझे भूख अधिक कष्ट नहीं देती है। इसके सिवा मैं दीर्घकालतक तपस्या कर चुका हूँ; इसलिये अब मुझे मरनेका भय नहीं है ॥ ६२ ॥ पुत्र उवाच अपत्यमस्मि ते पुंसस्त्राणात् पुत्र इति स्मृतः । आत्मा पुत्रः स्मृतस्तस्मात् त्राह्यात्मानमिहात्मना ॥ ६३ ॥ पुत्र बोला—तात! मैं आपका पुत्र हूँ, पुरुषका त्राण करनेके कारण ही संतानको पुत्र कहा गया है। इसके सिवा पुत्र पिताका अपना ही आत्मा माना गया है; अतः आप अपने आत्मभूत पुत्रके द्वारा अपनी रक्षा कीजिये ॥ ६३ ॥ पितोवाच रूपेण सदृशस्त्वं मे शीलेन च दमेन च । परीक्षितश्च बहुधा सक्तूनादद्धि ते सुत ॥ ६४ ॥ पिताने कहा—बेटा! तुम रूप, शील (सदाचार और सद्भाव) तथा इन्द्रियसंयमके द्वारा मेरे ही समान हो। तुम्हारे इन गुणोंकी मैंने अनेक बार परीक्षा कर ली है, अतः मैं