अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउक्त्वाथ वितथं प्रश्नं चेदीनामीश्वरः प्रभुः ॥ २३ ॥ इस प्रकार कहकर असत्य निर्णय देनेके कारण चेदिराज वसुको रसातलमें जाना पड़ा ॥ २३ ॥ तस्मान्न वाच्यं ह्येकेन बहुज्ञेनापि संशये । प्रजापतिमपाहाय स्वयम्भुवमृते प्रभुम् ॥ २४ ॥ अतः कोई संदेह उपस्थित होनेपर स्वयम्भू भगवान् प्रजापतिको छोड़कर अन्य किसी बहुज्ञ पुरुषको भी अकेले कोई निर्णय नहीं देना चाहिये ॥ २४ ॥ तेन दत्तानि दानानि पापेनाशुद्धबुद्धिना । तानि सर्वाण्यनादृत्य नश्यन्ति विपुलान्यपि ॥ २५ ॥ उस अशुद्ध बुद्धिवाले पापी पुरुषके दिये हुए दान कितने ही अधिक क्यों न हों, वे सब- के-सब अनाहत होकर नष्ट हो जाते हैं ॥ २५ ॥ तस्याधर्मप्रवृत्तस्य हिंसकस्य दुरात्मनः । दानेन कीर्तिर्भवति न प्रेत्येह च दुर्मतेः ॥ २६ ॥ अधर्ममें प्रवृत्त हुए दुर्बुद्धि दुरात्मा हिंसक मनुष्य जो दान देते हैं, उससे इहलोक या परलोकमें उनकी कीर्ति नहीं होती ॥ २६ ॥ अन्यायोपगतं द्रव्यमभीक्ष्णं यो ह्यपण्डितः । धर्माभिशंकी यजते न स धर्मफलं लभेत् ॥ २७ ॥ जो मूर्ख अन्यायोपार्जित धनका बारंबार संग्रह करके धर्मके विषयमें संशय रखते हुए यजन करता है, उसे धर्मका फल नहीं मिलता ॥ २७ ॥ धर्मवैतंसिको यस्तु पापात्मा पुरुषाधमः । ददाति दानं विप्रेभ्यो लोकविश्वासकारणम् ॥ २८ ॥ जो धर्मध्वजी, पापात्मा एवं नराधम है, वह लोकमें अपना विश्वास जमानेके लिये ब्राह्मणोंको दान देता है, धर्मके लिये नहीं ॥ २८ ॥ पापेन कर्मणा विप्रो धनं प्राप्य निरङ्कुशः । रागमोहान्वितः सोऽन्ते कलुषां गतिमश्नुते ॥ २९ ॥ जो ब्राह्मण पापकर्मसे धन पाकर उच्छृंखल हो राग और मोहके वशीभूत हो जाता है, वह अन्तमें कलुषित गतिको प्राप्त होता है ॥ २९ ॥ अपि संचयबुद्धिर्हि लोभमोहवशंगतः । उद्वेजयति भूतानि पापेनाशुद्धबुद्धिना ॥ ३० ॥ वह लोभ और मोहके वशमें पड़कर संग्रह करनेकी बुद्धिको अपनाता है। कृपणतापूर्वक पैसे बटोरनेका विचार रखता है। फिर बुद्धिको अशुद्ध कर देनेवाले पापाचारके द्वारा प्राणियोंको उद्वेगमें डाल देता है ॥ ३० ॥ एवं लब्ध्वा धनं मोहाद् यो हि दद्याद् यजेत वा ।