भारतकोश
अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

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द्वाविंशोऽध्यायः मन-बुद्धि और इन्द्रियरूप सप्त होताओंका, यज्ञ तथा मन- इन्द्रिय-संवादका वर्णन ब्राह्मण उवाच अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । सुभगे सप्तहोतॄणां विधानमिह यादृशम् ॥ १ ॥ ब्राह्मणे कहा—सुभगे! इसी विषयमें इस पुरातन इतिहासका भी उदाहरण दिया जाता है। सात होताओंके यज्ञका जैसा विधान है, उसे सुनो ॥ १ ॥ घ्राणश्चक्षुश्च जिह्वा च त्वक् श्रोत्रं चैव पञ्चमम् । मनो बुद्धिश्च सप्तैते होतारः पृथगाश्रिताः ॥ २ ॥ सूक्ष्मेऽवकाशे तिष्ठन्तो न पश्यन्तीतरेतरम् । एतान् वै सप्तहोतॄंस्त्वं स्वभावाद् विद्धि शोभने ॥ ३ ॥ नासिका, नेत्र, जिह्वा, त्वचा और पाँचवाँ कान, मन और बुद्धि—ये सात होता अलग- अलग रहते हैं। यद्यपि ये सभी सूक्ष्म शरीरमें ही निवास करते हैं तो भी एक-दूसरेको नहीं देखते हैं। शोभने! इन सात होताओंको तुम स्वभावसे ही पहचानो ॥ २-३ ॥ ब्राह्मप्युवाच सूक्ष्मेऽवकाशे सन्तस्ते कथं नान्योन्यदर्शिनः । कथंस्वभावा भगवंस्तदाचक्ष्व मे प्रभो ॥ ४ ॥ ब्राह्मणीने पूछा—भगवन्! जब सभी सूक्ष्म शरीरमें ही रहते हैं, तब एक-दूसरेको देख क्यों नहीं पाते? प्रभो! उनके स्वभाव कैसे हैं? यह बतानेकी कृपा करें ॥ ४ ॥ ब्राह्मण उवाच गुणाज्ञानमविज्ञानं गुणज्ञानमभिज्ञता । परस्परं गुणानेते नाभिजानन्ति कर्हिचित् ॥ ५ ॥ ब्राह्मणे कहा—प्रिये! (यहाँ देखनेका अर्थ है, जानना) गुणोंको न जानना ही गुणवान्को न जानना कहलाता है और गुणोंको जानना ही गुणवान्को जानना है। ये नासिका आदि सात होता एक-दूसरेके गुणोंको कभी नहीं जान पाते हैं (इसीलिये कहा गया है कि ये एक-दूसरेको नहीं देखते हैं) ॥ ५ ॥ जिह्वा चक्षुस्तथा श्रोत्रं वाङ्मनो बुद्धिरेव च । न गन्धानधिगच्छन्ति घ्राणस्तानधिगच्छति ॥ ६ ॥