अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रयोविंशोऽध्यायः प्राण, अपान आदिका संवाद और ब्रह्माजीका सबकी श्रेष्ठता बतलाना ब्राह्मण उवाच अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । सुभगे पञ्चहोतॄणां विधानमिह यादृशम् ॥ १ ॥ ब्राह्मणने कहा—प्रिये! अब पञ्चहोताओंके यज्ञका जैसा विधान है, उसके विषयमें एक प्राचीन दृष्टान्त बतलाया जाता है ।। १ ।। प्राणापानावुदानश्च समानो व्यान एव च । पञ्चहोतॄंस्तथैतान् वै परं भावं विदुर्बुधाः ॥ २ ॥ प्राण, अपान, उदान, समान और व्यान—ये पाँचों प्राण पाँच होता हैं। विद्वान् पुरुष इन्हें सबसे श्रेष्ठ मानते हैं ।। ब्राह्मण्युवाच स्वभावात् सप्तहोतार इति मे पूर्विका मतिः । यथा वै पञ्चहोतारः परो भावस्तदुच्यताम् ॥ ३ ॥ ब्राह्मणी बोली—नाथ! पहले तो मैं समझती थी कि स्वभावतः सात होता हैं; किंतु अब आपके मुँहसे पाँच होताओंकी बात मालूम हुई। अतः ये पाँचों होता किस प्रकार हैं? आप इनकी श्रेष्ठताका वर्णन कीजिये ।। ३ ।। ब्राह्मण उवाच प्राणेन सम्भृतो वायुरपानो जायते ततः । अपाने सम्भृतो वायुस्ततो व्यानः प्रवर्तते ॥ ४ ॥ व्यानेन सम्भृतो वायुस्ततोदानः प्रवर्तते । उदाने सम्भृतो वायुः समानो नाम जायते ॥ ५ ॥ तेऽपृच्छन्त पुरा सन्तः पूर्वजातं पितामहम् । यो नः श्रेष्ठस्तमाचक्ष्व स नः श्रेष्ठो भविष्यति ॥ ६ ॥ ब्राह्मणने कहा—प्रिये! वायु प्राणके द्वारा पुष्ट होकर अपानरूप, अपानके द्वारा पुष्ट होकर व्यानरूप, व्यानसे पुष्ट होकर उदानरूप, उदानसे परिपुष्ट होकर समानरूप होता है। एक बार इन पाँचों वायुओंने सबके पूर्वज पितामह ब्रह्माजीसे प्रश्न किया—‘भगवन्! हममें जो श्रेष्ठ हो उसका नाम बता दीजिये, वही हमलोगोंमें प्रधान होगा' ।। ४—६ ।।