भारतकोश
अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

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सर्वे प्राणाः प्राणभृतां शरीरे । मयि प्रचीर्णे च पुनश्चरन्ति श्रेष्ठो ह्यहं पश्यत मां प्रलीनम् ।। ११ ।। अपानने कहा—मेरे लीन होनेपर प्राणियोंके शरीरमें स्थित सभी प्राण लीन हो जाते हैं तथा मेरे संचरित होनेपर सब-के-सब संचार करने लगते हैं। इसलिये मैं ही सबसे श्रेष्ठ हूँ। देखो, अब मैं लीन हो रहा हूँ (फिर तुम्हारा भी लय हो जायगा) ।। ११ ।। ब्राह्मण उवाच व्यानश्च तमुदानश्च भाषमाणमथोचतुः । अपान न त्वं श्रेष्ठोऽसि प्राणो हि वशगस्तव ।। १२ ।। ब्राह्मण कहते हैं—तब व्यान और उदानने पूर्वोक्त बात कहनेवाले अपानसे कहा —'अपान! केवल प्राण तुम्हारे अधीन है, इसलिये तुम हमसे श्रेष्ठ नहीं हो सकते' ।। १२ ।। अपानः प्रचचाराथ व्यानस्तं पुनरब्रवीत् । श्रेष्ठोऽहमस्मि सर्वेषां श्रूयतां येन हेतुना ।। १३ ।। यह सुनकर अपान भी पूर्ववत् चलने लगा। तब व्यानने उससे फिर कहा—'मैं ही सबसे श्रेष्ठ हूँ। मेरी श्रेष्ठताका कारण क्या है। वह सुनो ।। १३ ।। मयि प्रलीने प्रलयं व्रजन्ति सर्वे प्राणाः प्राणभृतां शरीरे । मयि प्रचीर्णे च पुनश्चरन्ति श्रेष्ठो ह्यहं पश्यत मां प्रलीनम् ।। १४ ।। 'मेरे लीन होनेपर प्राणियोंके शरीरमें स्थित सभी प्राण लीन हो जाते हैं तथा मेरे संचरित होनेपर सब-के-सब संचार करने लगते हैं। इसलिये मैं ही सबसे श्रेष्ठ हूँ। देखो, अब मैं लीन हो रहा हूँ (फिर तुम्हारा भी लय हो जायगा)' ।। १४ ।। ब्राह्मण उवाच प्रलीयत ततो व्यानः पुनश्च प्रचार ह । प्राणापानावुदानश्च समानश्च तमब्रुवन् । न त्वं श्रेष्ठोऽसि नो व्यान समानस्तु वशे तव ।। १५ ।। ब्राह्मण कहते हैं—तब व्यान कुछ देरके लिये लीन हो गया, फिर चलने लगा। उस समय प्राण, अपान, उदान और समानने उससे कहा—'व्यान! तुम हमसे श्रेष्ठ नहीं हो, केवल समान वायु तुम्हारे वशमें है' ।। १५ ।। प्रचार पुनर्व्यानः समानः पुनरब्रवीत् । श्रेष्ठोऽहमस्मि सर्वेषां श्रूयतां येन हेतुना ।। १६ ।।