भारतकोश
अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

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क्योंकि वह धर्म ब्रह्मपदकी प्राप्ति करानेके लिये पर्याप्त था, वह सारा-का-सारा धर्म उसी रूपमें फिर दोहरा देना अब मेरे वशकी बात भी नहीं है ॥ १२ ॥ परं हि ब्रह्म कथितं योगयुक्तेन तन्मया । इतिहासं तु वक्ष्यामि तस्मिन्नर्थे पुरातनम् ॥ १३ ॥ उस समय योगयुक्त होकर मैंने परमात्मतत्त्वका वर्णन किया था। अब उस विषयका ज्ञान करानेके लिये मैं एक प्राचीन इतिहासका वर्णन करता हूँ ॥ १३ ॥ यथा तां बुद्धिमास्थाय गतिमग्रयां गमिष्यसि । शृणु धर्मभृतां श्रेष्ठ गदितं सर्वमेव मे ॥ १४ ॥ जिससे तुम उस समत्वबुद्धिका आश्रय लेकर उत्तम गति प्राप्त कर लोगे। धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ अर्जुन! अब तुम मेरी सारी बातें ध्यान देकर सुनो ॥ १४ ॥ आगच्छद् ब्राह्मणः कश्चित् स्वर्गलोकादरिंदम । ब्रह्मलोकाच्च दुर्धर्षः सोऽस्माभिः पूजितोऽभवत् ॥ १५ ॥ अस्माभिः परिपृष्टश्च यदाह भरतर्षभ । दिव्येन विधिना पार्थ तच्छृणुष्वाविचारयन् ॥ १६ ॥ शत्रुदमन! एक दिनकी बात है, एक दुर्धर्ष ब्राह्मण ब्रह्मलोकसे उतरकर स्वर्गलोकमें होते हुए मेरे यहाँ आये। मैंने उनकी विधिवत् पूजा की और मोक्षधर्मके विषयमें प्रश्न किया। भरतश्रेष्ठ! मेरे प्रश्नका उन्होंने सुन्दर विधिसे उत्तर दिया। पार्थ! वही मैं तुम्हें बतला रहा हूँ। कोई अन्यथा विचार न करके इसे ध्यान देकर सुनो ॥ १५-१६ ॥ ब्राह्मण उवाच मोक्षधर्मं समाश्रित्य कृष्ण यन्मामपृच्छथाः । भूतानामनुकम्पार्थं यन्मोहच्छेदनं विभो ॥ १७ ॥ तत् तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि यथावन्मधुसूदन । शृणुष्वावहितो भूत्वा गदतो मम माधव ॥ १८ ॥ ब्राह्मणने कहा—श्रीकृष्ण! मधुसूदन! तुमने सब प्राणियोंपर कृपा करके उनके मोहका नाश करनेके लिये जो यह मोक्ष-धर्मसे सम्बन्ध रखनेवाला प्रश्न किया है, उसका मैं यथावत् उत्तर दे रहा हूँ। प्रभो! माधव! सावधान होकर मेरी बात श्रवण करो ॥ १७-१८ ॥ कश्चिद् विप्रस्तपोयुक्तः काश्यपो धर्मवित्तमः । आससाद द्विजं कंचिद् धर्माणामार्गतागमम् ॥ १९ ॥ गतागते सुबहुशो ज्ञानविज्ञानपारगम् । लोकतत्त्वार्थकुशलं ज्ञातार्थं सुखदुःखयोः ॥ २० ॥ जातीमरणतत्त्वज्ञं कोविदं पापपुण्ययोः । द्रष्टारमुच्चनीचानां कर्मभिर्देहिनां गतिम् ॥ २१ ॥

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