भारतकोश
अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

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स्थिति है। यही उदानका उत्कृष्ट रूप है, जिसे ब्राह्मणलोग जानते हैं। जो निर्द्वन्द्व कहा गया है, उसे भी बताता हूँ, तुम मेरे मुखसे सुनो ॥ १२-१३ ॥ अहोरात्रमिदं द्वन्द्वं तयोर्मध्ये हुताशनः । एतद् रूपमुदानस्य परमं ब्राह्मणा विदुः ॥ १४ ॥ ये दिन और रात द्वन्द्व हैं, इनके मध्यभागमें अग्नि हैं। ब्राह्मणलोग इसीको उदानका उत्कृष्ट रूप मानते हैं ॥ १४ ॥ सच्चासचैव तद् द्वन्द्वं तयोर्मध्ये हुताशनः । एतद् रूपमुदानस्य परमं ब्राह्मणा विदुः ॥ १५ ॥ सत् और असत्—ये दोनों द्वन्द्व हैं तथा इनके मध्यभागमें अग्नि हैं। ब्राह्मणलोग इसे उदानका परम उत्कृष्ट रूप मानते हैं ॥ १५ ॥ ऊर्ध्वं समानो व्यानश्च व्यस्यते कर्म तेन तत् । तृतीयं तु समानेन पुनरेव व्यवस्यते ॥ १६ ॥ ऊर्ध्व अर्थात् ब्रह्म जिस संकल्प नामक हेतुसे समान और व्यानरूप होता है, उसीसे कर्मका विस्तार होता है। अतः संकल्पको रोकना चाहिये। जाग्रत् और स्वप्नके अतिरिक्त जो तीसरी अवस्था है, उससे उपलक्षित ब्रह्मका समानके द्वारा ही निश्चय होता है ॥ १६ ॥ शान्त्यर्थं व्यानमेकं च शान्तिर्ब्रह्म सनातनम् । एतद् रूपमुदानस्य परमं ब्राह्मणा विदुः ॥ १७ ॥ एकमात्र व्यान शान्तिके लिये है। शान्ति सनातन ब्रह्म है। ब्राह्मणलोग इसीको उदानका परम उत्कृष्ट रूप मानते हैं ॥ १७ ॥ इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि ब्राह्मणगीतासु चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें ब्राह्मण-गीताविषयक चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २४ ॥