अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंये प्राण आदि इन्द्रियाँ गुणवान् हैं, अतः अपने शुभाशुभ विषयोंरूप गुणोंका उपभोग करती हैं। मैं निर्गुण और अनन्त हूँ, (इनसे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है, यह समझ लेनेपर) ये सातों—घ्राण आदि मोक्षके हेतु होते हैं ॥ ७ ॥ विदुषां बुध्यमानानां स्वं स्वं स्थानं यथाविधि । गुणास्ते देवताभूताः सततं भुञ्जते हविः ॥ ८ ॥ विभिन्न विषयोंका अनुभव करनेवाले विद्वानोंके घ्राण आदि अपने-अपने स्थानको विधिपूर्वक जानते हैं और देवता-रूप होकर सदा हविष्यका भोग करते हैं ॥ ८ ॥ अदन्नन्नान्यथोऽविद्वान् ममत्वेनोपपद्यते । आत्मार्थे पाचयनन्नं ममत्वेनोपहन्यते ॥ ९ ॥ अज्ञानी पुरुष अन्न भोजन करते समय उसके प्रति ममत्वसे युक्त हो जाता है। इसी प्रकार जो अपने लिये भोजन पकाता है, वह भी ममत्व दोषसे मारा जाता है ॥ ९ ॥ अभक्ष्यभक्षणं चैव मद्यपानं च हन्ति तम् । स चान्नं हन्ति तं चान्नं स हत्वा हन्यते पुनः ॥ १० ॥ वह अभक्ष्य-भक्षण और मद्यपान-जैसे दुर्व्यसनोंको भी अपना लेता है, जो उसके लिये घातक होते हैं। वह भक्षणके द्वारा उस अन्नकी हत्या करता है और उसकी हत्या करके वह स्वयं भी उसके द्वारा मारा जाता है ॥ १० ॥ हन्ता ह्यन्नमिदं विद्वान् पुनर्जनयतीश्वरः । न चान्नाज्जायते तस्मिन् सूक्ष्मो नाम व्यतिक्रमः ॥ ११ ॥ जो विद्वान् इस अन्नको खाता है, अर्थात् अन्नसे उपलक्षित समस्त प्रपंचको अपने- आपमें लीन कर देता है, वह ईश्वर—सर्वसमर्थ होकर पुनः अन्न आदिका जनक होता है। उस अन्नसे उस विद्वान् पुरुषमें कोई सूक्ष्म-से-सूक्ष्म दोष भी नहीं उत्पन्न होता ॥ ११ ॥ मनसा गम्यते यच्च यच्च वाचा निगद्यते । श्रोत्रेण श्रूयते यच्च चक्षुषा यच्च दृश्यते ॥ १२ ॥ स्पर्शेन स्पृश्यते यच्च घ्राणेन घ्रायते च यत् । मनःषष्ठानि संयम्य हवींष्येतानि सर्वशः ॥ १३ ॥ गुणवत्पावको मह्यं दीव्यतेऽन्तःशरीरगः । जो मनसे अवगत होता है, वाणीद्वारा जिसका कथन होता है, जिसे कानसे सुना और आँखसे देखा जाता है, जिसको त्वचासे छूआ और नासिकासे सूँघा जाता है। इन मन्तव्य आदि छहों विषयरूपी हविष्योंका मन आदि छहों इन्द्रियोंके संयमपूर्वक अपने-आपमें होम करना चाहिये। उस होमके अधिष्ठानभूत गुणवान् पावकरूप परमात्मा मेरे तन-मनके भीतर प्रकाशित हो रहे हैं ॥ १२-१३ १/२ ॥ योगयज्ञः प्रवृत्तो मे ज्ञानवह्निप्रदोद्भवः । प्राणस्तोत्रोऽपानशस्त्रः सर्वत्यागसुदक्षिणः ॥ १४ ॥