अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तविंशोऽध्यायः अध्यात्मविषयक महान् वनका वर्णन ब्राह्मण उवाच संकल्पदंशमशकं शोकहर्षहिमातपम् । मोहान्धकारतिमिरं लोभव्याधिसरीसृपम् ।। १ ।। विषयैकात्ययाध्वानं कामक्रोधविरोधकम् । तदतीत्य महादुर्गं प्रविष्टोऽस्मि महद् वनम् ।। २ ।। ब्राह्मणने कहा—प्रिये! जहाँ संकल्परूपी डाँस और मच्छरोंकी अधिकता होती है। शोक और हर्षरूपी गर्मी, सर्दीका कष्ट रहता है, मोहरूपी अन्धकार फैला हुआ है, लोभ तथा व्याधिरूपी सर्प विचरा करते हैं। जहाँ विषयोंका ही मार्ग है, जिसे अकेले ही तै करना पड़ता है तथा जहाँ काम और क्रोधरूपी शत्रु डेरा डाले रहते हैं, उस संसाररूपी दुर्गम पथका उल्लंघन करके अब मैं ब्रह्मरूपी महान् वनमें प्रवेश कर चुका हूँ ।। १-२ ।। ब्राह्मण्युवाच क्व तद् वनं महाप्राज्ञ के वृक्षाः सरितश्च काः । गिरयः पर्वताश्चैव कियत्यध्वनि तद् वनम् ।। ३ ।। ब्राह्मणीने पूछा—महाप्राज्ञ! वह वन कहाँ है? उसमें कौन-कौनसे वृक्ष, गिरि, पर्वत और नदियाँ हैं तथा वह कितनी दूरीपर है ।। ३ ।। ब्राह्मण उवाच नैतदस्ति पृथग्भावः किंचिदन्यत् ततः सुखम् । नैतदस्त्यपृथग्भावः किंचिद् दुःखतरं ततः ।। ४ ।। ब्राह्मणने कहा—प्रिये! उस वनमें न भेद है न अभेद, वह इन दोनोंसे अतीत है। वहाँ लौकिक सुख और दुःख दोनोंका अभाव है ।। ४ ।। तस्माद् ह्रस्वतरं नास्ति न ततोऽस्ति महत्तरम् । नास्ति तस्मात् सूक्ष्मतरं नास्त्यन्यत् तत्समं सुखम् ।। ५ ।। उससे अधिक छोटी, उससे अधिक बड़ी और उससे अधिक सूक्ष्म भी दूसरी कोई वस्तु नहीं है। उसके समान सुखरूप भी कोई नहीं है ।। ५ ।। न तत्राविश्य शोचन्ति न प्रहृष्यन्ति च द्विजाः । न च बिभ्यति केषांचित् तेभ्यो बिभ्यति केचन ।। ६ ।। उस वनमें प्रविष्ट हो जानेपर द्विजातियोंको न हर्ष होता है, न शोक। न तो वे स्वयं किन्हीं प्राणियोंसे डरते हैं और न उन्हींसे दूसरे कोई प्राणी भय मानते हैं ।। ६ ।।