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अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

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पृष्ठ 64

गुण ही फल है। सात अतिथि ही फलोंके भोक्ता हैं ।। १३ ।। आतिथ्यं प्रतिगृह्णन्ति तत्र तत्र महर्षयः । अर्चितेषु प्रलीनेषु तेष्वन्यद् रोचते वनम् ।। १४ ।। वे महर्षिगण इस यज्ञमें आतिथ्य ग्रहण करते हैं और पूजा स्वीकार करते ही उनका लय हो जाता है। तत्पश्चात् वह ब्रह्मरूप वन विलक्षणरूपसे प्रकाशित होता है ।। १४ ।। प्रज्ञावृक्षं मोक्षफलं शान्तिच्छायासमन्वितम् । ज्ञानाश्रयं तृप्तितोयमन्तःक्षेत्रज्ञभास्करम् ।। १५ ।। उसमें प्रज्ञारूपी वृक्ष शोभा पाते हैं, मोक्षरूपी फल लगते हैं और शान्तिमयी छाया फैली रहती है। ज्ञान वहाँका आश्रयस्थान और तृप्ति जल है। उस वनके भीतर आत्मारूपी सूर्यका प्रकाश छाया रहता है ।। १५ ।। येऽधिगच्छन्ति तं सन्तस्तेषां नास्ति भयं पुनः । ऊर्ध्वं चाधश्च तिर्यक् च तस्य नान्तोऽधिगम्यते ।। १६ ।। जो श्रेष्ठ पुरुष उस वनका आश्रय लेते हैं, उन्हें फिर कभी भय नहीं होता। वह वन ऊपर-नीचे तथा इधर-उधर सब ओर व्याप्त है। उसका कहीं भी अन्त नहीं है ।। १६ ।। सप्त स्त्रियस्तत्र वसन्ति सद्य- स्त्ववाङ्मुखा भानुमत्यो जनित्र्यः । ऊर्ध्वं रसानाददते प्रजाभ्यः सर्वान् यथा सत्यमनित्यता च ।। १७ ।। वहाँ सात स्त्रियाँ निवास करती हैं, जो लज्जाके मारे अपना मुँह नीचेकी ओर किये रहती हैं। वे चिन्मय ज्योतिसे प्रकाशित होती हैं। वे सबकी जननी हैं और वे उस वनमें रहनेवाली प्रजासे सब प्रकारके उत्तम रस उसी प्रकार ग्रहण करती हैं, जैसे अनित्यता सत्यको ग्रहण करती है ।। १७ ।। तत्रैव प्रतिष्ठन्ति पुनस्तत्रोपयन्ति च । सप्त सप्तर्षयः सिद्धा वसिष्ठप्रमुखैः सह ।। १८ ।। सात सिद्ध सप्तर्षि वसिष्ठ आदिके साथ उसी वनमें लीन होते और उसीसे उत्पन्न होते हैं ।। १८ ।। यशो वर्चो भगश्चैव विजयः सिद्धतेजसः । एवमेवानुवर्तन्ते सप्त ज्योतींषि भास्करम् ।। १९ ।। यश, प्रभा, भग (ऐश्वर्य), विजय, सिद्धि (ओज) और तेज—ये सात ज्योतियाँ उपर्युक्त आत्मारूपी सूर्यका ही अनुसरण करती हैं ।। १९ ।। गिरयः पर्वताश्चैव सन्ति तत्र समासतः । नद्यश्च सरितो वारि वहन्त्यो ब्रह्मसम्भवम् ।। २० ।।