अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मणने कहा—देवि! तदनन्तर अलर्कने उसी पेड़के नीचे बैठकर घोर तपस्या की, किंतु उससे मन-बुद्धिसहित पाँचों इन्द्रियोंको मारनेयोग्य किसी उत्तम बाणका पता न चला ॥ २६ ॥ सुसमाहितचेतास्तु स ततोऽचिन्तयत् प्रभुः । स विचिन्त्य चिरं कालमलर्को द्विजसत्तम ॥ २७ ॥ नाध्यगच्छत् परं श्रेयो योगान्मतिमतां वरः । तब वे सामर्थ्यशाली राजा एकाग्रचित्त होकर विचार करने लगे। विप्रवर! बहुत दिनोंतक निरन्तर सोचने-विचारनेके बाद बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ राजा अलर्कको योगसे बढ़कर दूसरा कोई कल्याणकारी साधन नहीं प्रतीत हुआ ॥ २७ १/२ ॥ स एकाग्रं मनः कृत्वा निश्चलो योगमास्थितः ॥ २८ ॥ इन्द्रियाणि जघानाशु बाणेनैकेन वीर्यवान् । योगेनात्मानमाविश्य सिद्धिं परमिकां गतः ॥ २९ ॥ वे मनको एकाग्र करके स्थिर आसनसे बैठ गये और ध्यानयोगका साधन करने लगे। इस ध्यानयोगरूप एक ही बाणसे मारकर उन बलशाली नरेशने समस्त इन्द्रियोंको सहसा परास्त कर दिया। वे ध्यानयोगके द्वारा आत्मामें प्रवेश करके परम सिद्धि (मोक्ष)-को प्राप्त हो गये ॥ २८-२९ ॥ विस्मितश्चापि राजर्षिरिमां गाथां जगाद ह । अहो कष्टं यदस्माभिः सर्वं बाह्यमनुष्ठितम् ॥ ३० ॥ भोगतृष्णासमायुक्तैः पूर्वं राज्यमुपासितम् । इति पश्चान्मया ज्ञातं योगान्नास्ति परं सुखम् ॥ ३१ ॥ इस सफलतासे राजर्षि अलर्कको बड़ा आश्चर्य हुआ और उन्होंने इस गाथाका गान किया—'अहो! बड़े कष्टकी बात है कि अबतक मैं बाहरी कामोंमें ही लगा रहा और भोगोंकी तृष्णासे आबद्ध होकर राज्यकी ही उपासना करता रहा। ध्यानयोगसे बढ़कर दूसरा कोई उत्तम सुखका साधन नहीं है, यह बात तो मुझे बहुत पीछे मालूम हुई है' ॥ ३०-३१ ॥ इति त्वमनुजानीहि राम मा क्षत्रियान् जहि । तपो घोरमुपातिष्ठ ततः श्रेयोऽभिपत्स्यसे ॥ ३२ ॥ (पितामहोंने कहा—) बेटा परशुराम! इन सब बातोंको अच्छी तरह समझकर तुम क्षत्रियोंका नाश न करो। घोर तपस्यामें लग जाओ, उसीसे तुम्हें कल्याण प्राप्त होगा ॥ ३२ ॥ इत्युक्तः स तपो घोरं जामदग्न्यः पितामहैः । आस्थितः सुमहाभागो ययौ सिद्धिं च दुर्गमाम् ॥ ३३ ॥