भारतकोश
अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

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पृष्ठ 82

एकत्रिंशोऽध्यायः राजा अम्बरीषकी गायी हुई आध्यात्मिक स्वराज्यविषयक गाथा ब्राह्मण उवाच त्रयो वै रिपवो लोके नवधा गुणतः स्मृताः । प्रहर्षः प्रीतिरानन्दस्त्रयस्ते सात्त्विका गुणाः ॥ १ ॥ तृष्णा क्रोधोऽभिसंरम्भो राजसास्ते गुणाः स्मृताः । श्रमस्तन्द्रा च मोहश्च त्रयस्ते तामसा गुणाः ॥ २ ॥ ब्राह्मणने कहा—देवि! इस संसारमें सत्त्व, रज और तम—ये तीन मेरे शत्रु हैं। ये वृत्तियोंके भेदसे नौ प्रकारके माने गये हैं। हर्ष, प्रीति और आनन्द—ये तीन सात्त्विक गुण हैं; तृष्णा, क्रोध और द्वेषभाव—ये तीन राजस गुण हैं और थकावट, तन्द्रा तथा मोह—ये तीन तामस गुण हैं ॥ १-२ ॥ एतान् निकृत्य धृतिमान् बाणसंघैरतन्द्रितः । जेतुं परानुत्सहते प्रशान्तात्मा जितेन्द्रियः ॥ ३ ॥ शान्तचित्त, जितेन्द्रिय, आलस्यहीन और धैर्यवान् पुरुष शम-दम आदि बाण-समूहोंके द्वारा इन पूर्वोक्त गुणोंका उच्छेद करके दूसरोंको जीतनेका उत्साह करते हैं ॥ ३ ॥ अत्र गाथाः कीर्तयन्ति पुराकल्पविदो जनाः । अम्बरीषेण या गीता राज्ञा पूर्वं प्रशाम्यता ॥ ४ ॥ इस विषयमें पूर्वकालकी बातोंके जानकार लोग एक गाथा सुनाया करते हैं। पहले कभी शान्तिपरायण महाराज अम्बरीषने इस गाथाका गान किया था ॥ ४ ॥ समुदीर्णेषु दोषेषु बाध्यमानेषु साधुषु । जग्राह तरसा राज्यमम्बरीषो महायशाः ॥ ५ ॥ कहते हैं—जब दोषोंका बल बढ़ा और अच्छे गुण दबने लगे, उस समय महायशस्वी महाराज अम्बरीषने बलपूर्वक राज्यकी बागडोर अपने हाथमें ली ॥ ५ ॥ स निगृह्यात्मनो दोषान् साधून् समभिपूज्य च । जगाम महतीं सिद्धिं गाथाश्चेमा जगाद ह ॥ ६ ॥ उन्होंने अपने दोषोंको दबाया और उत्तम गुणोंका आदर किया। इससे उन्हें बहुत बड़ी सिद्धि प्राप्त हुई और उन्होंने यह गाथा गायी— ॥ ६ ॥ भूयिष्ठं विजिता दोषा निहताः सर्वशत्रवः । एको दोषो वरिष्ठश्च वध्यः स न हतो मया ॥ ७ ॥